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190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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वकालत के पेशे में नीति के मार्ग से चलना चाहिए

21 जुलाई, 1950 के दिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर औरंगाबाद पहुंचे। स्टेशन पर स्वागत के लिए तहसीलदार आयु. गोविंदराव देशपांडे, पुलिस सुपरिंटेंडेंट आयु. हरिश्चंद्र, अन्य अधिकारी, स्थानीय नेता, वकील और शे. का. फेडरेशन के हजारों लोग उपस्थित थे।

गार्ड ऑफ ऑनर

पुष्पमाला अर्पण करने के बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर रंगमंच से नीचे उतर कर आए। स्थानीय पुलिस से गार्ड ऑफ ऑनर स्वीकार किया। उसके बाद नारों की गूंज में शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन के लोगों ने उन्हें फूलमालाएं अर्पण कीं।

उसके बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर प्रिन्सिपल लेखापाल और आयु. चित्रे के साथ पीपल्स एजुकेशन सोसाइटी की इमारत की ओर रवाना हुए। वहां निरीक्षण कर वे फिर सेलुन की ओर लौटे।

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर कॉलेज के समारोह में उपस्थित रहे और उन्होंने कॉलेज की नई इमारत की जगह का मुआयना किया। इस इमारत का पहला पत्थर डॉ. बाबासाहेब के करकमलों द्वारा रखा जाना था।

कोर्ट को भेट

दिनांक 23 को कॉलेज की नई इमारत देखने के बाद वे सेशन्स कोर्ट गए। सेशन्स कोर्ट के जज आयु. चंद्रकांत गोडसे ने उनका स्वागत किया और उन्हें कोर्ट और बार एसोसिएशन का परिसर दिवाया।

इसके बाद डॉ. साहब के बारे में जज गोडसे ने कहा डॉ. अम्बेडकर आधुनिक मनु हैं। उसके बाद डॉ. बाबासाहेब ने मुन्सिफ कोर्ट का उर्दू में चलने वाला कामकाज सुना। इस कामकाज के बारे में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा-

उर्दू में जो काम चल रहा था उसे मैं समझ तो नहीं पाया लेकिन वह संतोषजनक था ऐसा मुझे लगता है।

कई बार मेरा मन इस बात की चिंता में व्यग्र हो उठता है कि कोर्ट की भाषा क्या

जनता, 29 जुलाई, 1950