233 14-1-1946 जो लोग करोड़ों लोगों को अछूत और अपराधी मानते हां उन्हें आजादी मांगने का हक नहीं - सोलापुर - Page 21

2 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैं अभी मंत्री हूं। केंद्र सरकार की ओर से मजदूरों के हितो के बारे में अधिक ध्यान दिया जा रहा है। 1930 में इस मुद्दे को लेकर रॉयल कमीशन का गठन किया गया था। इस आयोग ने कई सूचनाएं की थीं। 1930 से 1942 तक का इतिहास देखने से यह पता चलेगा कि इस बारे में कुछ भी काम नहीं हुआ है, लेकिन 1942 से अर्थात् मेरे मंत्री पद ग्रहण करने के बाद से आज 1946 तक केवल 3 वर्षों में विकास हुआ दिखाई देगा। यह आत्मप्रशंसा नहीं, बल्कि वास्तविकता है। 1920 से आज तक केंद्रीय एसेंब्ली में मजदूरों के केवल एक प्रतिनिधि को लिया जाता था। आज आप देखेंगे कि लोकसभा में 3 मजदूर प्रतिनिधि हैं। अब तक काउंसिल ऑफ स्टेटस् में एक भी मजदूर प्रतिनिधि नहीं लिया जाता था, लेकिन अब से एक प्रतिनिधि वहां भी लिया जाएगा।

आगामी केंद्रीय एसेंब्ली की बैठक में 10 बिल पेश होने वाले हैं जो मजदूरों के हित में होंगे। इनके मसौदे मैंने तैयार किए हैं। इससे पता चलेगा कि किस तरह देश में सामाजिक और आर्थिक दरिद्रता को दूर करने की कोशिशें जारी हैं।

देश की सामाजिक स्थितियां अजीब हो गई हैं। देश के छह करोड़ लोगों को अछूत मानने वाले और छुआछूत का पालन करने वाले लोग इस देश में हैं। इस देश में अपराधों को व्यवसाय के तौर पर उपजीविका का साधन बनाने वाले 25 लाख लोग हैं। इतिहास बताता है कि आठ हजार वर्ष पूर्व इस देश में संस्कृति का निर्माण हुआ। ऐसे भी करोड़ों लोग हैं, जिन्हें यह नहीं पता कि कैसे कपड़े पहनें, खाना क्या खाएं आदि। जो सामर्थ्यवान हैं उन पर यह जिम्मेदारी है। देश आजाद हो कहने वालों पर यह जिम्मेदारी और ज्यादा है। जो लोग करोड़ों लोगों को अछूत और अपराधी मानते हैं उन्हें आजादी मांगने का हक कैसे हो सकता है? इस जिम्मेदारी को टाला नहीं जा सकता।

आजादी मांगना बहुत आसान है। मुझसे कई बार पूछा जाता है कि डॉ. साहेब ‘‘आप काँग्रेस में क्यों नहीं शामिल हो जाते? आपका सम्मान बढ़ेगा, हर रोज अखबार में मौके की जगह पर आपका नाम छपेगा।‘‘ लेकिन मुझे यह मंजूर नहीं। बोलने से अधिक काम करने की जरूरत होती है। मैं कहीं भी जाऊं, जब ऐसी स्थितियों से सामना होता है तो मन व्यथित होता है। अस्पृश्यता निवारण का असली काम मैं ही कर रहा हूं।

असल में यह काम स्पृश्य समाज के नेताओं का है। अंग्रेजों से आजादी मांगने वालों को अपने देश की छुआछूत की समस्या के निवारण का काम हाथ में लेना चाहिए। स्वराज मांगने वाले इन लोगों के बारे में अंग्रेज मन ही मन क्या सोचते हैं, इसका मुझे अहसास है। जितनी जल्दी अस्पृश्यता नष्ट होगी उतनी ही जल्दी हमें आजादी मिलेगी (स्वराज हाथ में आएगा)। यह निश्चित है कि उसके बगैर स्वराज नहीं मिलेगा।