198 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पंजाब के अस्पृश्यों में हैं। लोकसभा में पिछले दो सालों से मेरे सामने ऐसे तीस सदस्य बैठते हैं। उनमें से किसी को भी मैंने अस्पृश्यों के कल्याण के बारे में, उस वर्ग पर होने वाले अत्याचारों के बारे में कोई सवाल उठाते नहीं देखा। लोकसभा में फिलहाल बजट के बारे में चर्चा हो रही है। अनाज, मुद्रास्फीती, कपड़े और चीनी की किल्लत के बारे में सरकार की खिंचाई करने का अवसर कोई नहीं छोड़ता, लेकिन पंजाब में अस्पृश्यों पर अत्याचार हो रहे हैं उसके बारे में आप क्या कर रहे हैं? यह सवाल किसी ने भी नहीं उठाया।
ऐसे अगर हजारों सदस्य भी लोकसभा में हों तब भी अस्पृश्यों का क्या फायदा होगा? ऐसे मूक लोग क्या कर सकते हैं? मैं एक मंत्री हूं इसलिए मेरे मुंह पर ताला पड़ा है। मैं सरकार में नहीं था, तब जुल्म और जबरदस्तियों के खिलाफ मैं आवाज उठाया करता था। उस वक्त मैं कोई भी अन्याय सरकार की नजरों में ला सकता था। अब मेरे मुंह पर ताला पड़ा है। जिन सदस्यों से अस्पृश्य वर्ग की आवाज उठाने की उम्मीद होती है वे भी चुप बैठते हैं।
देश के विभिन्न हिस्सों से अस्पृश्य वर्ग के हजारों लोग मदद पाने के लिए दिल्ली आते हैं। उनके लिए दिल्ली के अम्बेडकर भवन में इंतजाम किया जाने वाला है। यह भवन सवर्ण हिंदुओं से एक पैसा लिए बिना दलितों को अपनी हिम्मत से खड़ा करना चाहिए।
गांधीजी द्वारा अस्पृश्योद्धार का आंदोलन अपने हाथ में जबसे लिया तब से सवर्ण हिंदुओं के नजरिए में फर्क आया है यह बात मैं मानता हूं। लेकिन श्रीमान शर्मा जैसे व्यक्तियों की सहानुभूति महत्वपूर्ण होने के बावजूद हमें अपनी हिम्मत के सहारे ही डटे रहना है। अपने ऊपर ही हमें निर्भर रहना होगा । भूखे आदमी को रोटी चाहिए केवल सहानुभूति से काम नहीं चलता। हम अगर एकजुट होकर खड़े हो जाएं तो अपने हितैषियों की मदद से और उनके सहयोग से हम अपनी स्थिति में सुधार ला सकते हैं।
पहले केंद्रीय सरकार के दफतरों में एक भी अस्पृश्य वर्ग का व्यक्ति नहीं था। अस्पृश्य व्यक्ति तब पट्टे वाला यानी सिपाही भी नहीं बन सकता था। उसके बाद हमारी कोशिश रंग लाती रहीं और अस्पृश्यों को नौकरियों में आरक्षण मिला। उनकी शिक्षा के लिए सालाना तीन लाख रुपए मंजूर किए गए।’’
भवन को अपना नाम दिए जाने के प्रति बाबासाहेब ने नाराजगी स्पष्ट की। नाम अगर बदला गया तो उन्हें खुशी होने की बात भी उन्होंने कही।