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बुद्ध ने वर्णाश्रम धर्म नकारा
दिल्ली शेड्यूल्ड कास्टस् वेलफेयर एसोसिएशन और भारतीय महाबोधि सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में नई दि८ी में दिनांक 19, 20 और 21 मई, 1951 के दिन बडी धूम-धाम से बुद्ध जयंति मनाई गई।
शनिवार दिनांक 19 को दिल्ली में बहुत बड़ा जुलूस निकाला गया था। रीडिंग रोड के बुद्ध विहार के पास से इरविन रोड, कनाट सर्किल, पंचकुइयां रोड़ आदि गुजरते हुए दिल्ली शेड्यूल्ड कास्टस् वेलफेयर एसोसिएशन के अम्बेडकर भवन के पास वाले मैदान में जुलूस विसर्जित हुआ।
रविवार दिनांक 20 को एक बड़ी सभा हुई। इस सभा के अध्यक्ष भारत में फ्रांस के वकील ने किया था। इस सभा में भारत में फिनलैंड के प्रतिनिधि ने ना ह्यागो वॉलवन, बर्मा के कौंसिल जनरल ने ना टिन मांग गी, सिलोन के हाइकमीश्नर ने. ना. कुमारस्वामी, नागपूर के प्रो. कुलकर्णी उपस्थित थे। सभा में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा-
अध्यक्ष महाराज, बहनों और भाईयो,
यहां आए आपको दो-तीन घंटे बीते होंगे और स्पष्ट है कि आपको अपने घर लौटने की जल्दी हो रही होगी। इसलिए मैं ज्यादा समय नहीं लूंगा। मुझसे पहले के वक्ताओं ने भगवान बुद्ध के चरित्र के बारे में बहुत सी बातें बताई हैं। मैं जो बताना चाहता हूं वह जरूरी नहीं कि मैं आज ही बताऊं। ऐसा नहीं कि आज के बाद हमारी मुलाकात नहीं होगी। हम बार-बार मिलने वाले हैं। इसके बावजूद कई लोगों का आग्रह है कि मुझे कुछ कहना होगा इसलिए मुझे थोड़ा बोलना पड़ेगा।
मेरी इच्छा है कि भारत के सभी अस्पृश्य बुद्ध की शिक्षा आत्मसात करें और उसी के अनुसार अपना व्यवहार रखें। पिछले वर्ष बुद्ध जयंति के अवसर पर हम यहां इकठ्ठा हुए थे। तब इतनी भीड़ नहीं थी। आज यहां इतने लोग इकठ्ठा हुए हैं, एक साल में लोगों में इतना रुझान पैदा हुआ है यह देखकर मुझे अच्छा लग रहा है। साथ ही, अस्पृश्यों से संबंधित खबरों को जगह न देने वाले अखबारों में कल के विशाल जुलूस की खबर भी मुझे पढ़ने को मिली। आपने जो प्रगति की है वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय है।
बुद्ध जयंति मनाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। क्योंकि बड़े-बड़ों के काम के
जनताः 26 मई, 1951