278 20-5-1951 बुद्ध ने वर्णाश्रम धर्म नकारा - नई दिल्ली - Page 220

 201

की भक्ति कर पाते हैं। पिछले वर्ष सिलोन से लौटते वक्त मैं मद्रास गया था। तब वहां के कई हिंदुओं ने मुझसे मंदिर देखने की विनति की। मुझे आश्चर्य लगा, मैं गया भी। मैंने घूम-घूम कर हिंदुओं के मंदिर देखे। वहां ब्राह्मण लोग मूर्ति पूजा करते थे, धूप-कपूर जलाते थे। इसके अलावा वे और कोई काम नहीं करते हैं ऐसा मुझे पता चला। मतलब कि यह उनका एक महत्वपूर्ण उद्योग बना! उनके दूसरे उद्योग के बारे में मुझे पता चला कि उन्हें बहुत भोजन खाना पड़ता है। सुबह का भोजन, दोपहर का भोजन, शाम का भोजन। भोजन का बहुत बड़ा उद्योग वे लोग करते हैं। मैंने उनसे पूछा कि यह सब कैसे चलता है? जवाब मिला कि मद्रास सरकार से उन्हें सालाना डेढ लाख रुपयों की ग्रांट मिलती है। कुछ मंदिरों में सोने-चांदी की मूर्तियां दिखाई दीं। इनमें से कुछ मूर्तियों की कीमत करोड़ों रुपयों में ही हो सकती है। एक तरफ देश में लोग भूख से मर रहे हैं। लोग पैसे-पैसे के लिए मुहताज हैं और दूसरी ओर अनाज का ऐसा प्रयोग और रुपयों-पैसों की ऐसी खैरात। और यह सब हिंदू धर्म के यज्ञों के लिए। फिर क्यों न ये लोग हिंदु धर्म की जयकार करेंगे!

धर्म विशुद्ध सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। बुद्ध कभी वर्णाश्रम धर्म में विश्वास नहीं रखते थे। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि हम सब एक से हैं। मनुष्य-मनुष्य के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। जन्म पर कोई श्रेष्ट या निम्न नहीं हो सकता। श्रेष्टता या नीचता केवल अपनी करनी के आधार से ही प्राप्त होती है। बुद्ध ने ये बातें बताई हैं । लोग अगर फिर बौद्ध धर्म का स्वीकार करेंगे तो यह देश एक बार फिर वैभवसंपन्न बनेगा किसी और तरह से जातिभेद खत्म होना संभव नहीं है। सचमुच अगर कोई जाति-धर्म खत्म करना चाहते हैं तो उनके लिए केवल यही एक उपाय है कि वे बौद्ध धर्म को स्वीकार करें।

लेकिन हम बिना किसी हड़बड़ी मचाए अपने उद्देश्य को हासिल करेंगे। जिनके हाड़-मांस में हिंदू धर्म रच-बस गया है उन बुजुर्गों के लिए तुरंत अपना धर्म त्यागना संभव नहीं होगा और उनसे मैं ऐसा कहूंगा भी नहीं। लेकिन युवाओं के बारे में मुझे बहुत विश्वास है। वे जरुर सही मार्ग अपना कर अपना, समाज का और राष्ट्र का हित करेंगे।