279 1-9-1951 उच्च शिक्षा ही हमारी सभी सामाजिक बीमारियों का इलाज है - औरंगाबाद - Page 221

202 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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उच्च शिक्षा ही हमारी सभी सामाजिक बीमारियों का इलाज है

पीपल्स एजुकेशन सोसाइटी द्वारा चलाए जाने वाले औरंगाबाद के मिलिंद महाविद्यालय की इमारत की बुनियाद भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्रप्रसाद के हाथों 1 सितंबर, 1951 के दिन रखी गई। इस अवसर पर डॉ. राजेंद्रप्रसाद ने अस्पृश्य और गरीब लोगों के बीच बाबासाहेब द्वारा किए जा रहे शिक्षा प्रसार के कार्य की प्रशंसा की। पीपल्स एजुकेशन सोसाइटी के उद्देश्य और लक्ष्य की उन्होंने भरसक प्रशंसा की। राष्ट्रपति द्वारा नींव का पत्थर रखे जाने से पहले डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण हुआ-

अध्यक्ष महोदय,

जिस कॉलेज की नींव रखने की मैं आपसे विनति कर रहा हूं वह यह कॉलेज 19 जून 1950 के दिन अस्तित्व में आया। कॉलेज वोल कर और उसका कामकाज देखने वालों के बारे में तथा कॉलेज क्यों शुरु किया गया इस बारे में आज अगर दो शब्द कहे जाएं तो गलत नहीं होगा, ऐसा मुझे लगता है। पीपल्स एजुकेशन सोसाइटी, मुंबई इस संस्था द्वारा यह कॉलेज चलाया जाता है और इस संस्था का अध्यक्ष में हूं। यह सोसाइटी 1945 में स्थापित की गई। पूरे देश में और खासकर मुख्य रूप से पिछड़े वर्गों के बीच शिक्षा का प्रसार करना इस संस्था का प्रमुख लक्ष्य और उद्देश्य है। इसी उद्देश्य के अनुसार 1946 में मुंबई में सिद्धार्थ कॉलेज खोला गया। मुझे बेहद खुशी है कि इन चार सालों में ही छात्रों की संख्या, देसी-विदेशी खेल और शिक्षा का दर्जा इन सभी मोर्चों पर सिद्धार्थ कॉलेज मुंबई राज्य में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया है। आज इस कॉलेज में 800 छात्र हैं। अन्यत्र छात्रों की इतनी बडी संख्या कम ही देखने में आती हैं। इंटर कॉलेज खेल प्रतियोगिताओं में ऐसा कोई खेल नहीं होगा जिसमें सिद्धार्थ कॉलेज ने विजय प्राप्त नहीं की हो। मुंबई विश्वविद्यालय की मशहूर छात्रवृत्तियां और पुरस्कार भी कॉलेज ने जीते हैं। सिद्धार्थ कॉलेज की इस उज्जवल परंपरा के बारे में पीपल्स एजुकेशन सोसाइटी को गर्व है।

मुंबई के इस कॉलेज के पिछले चार सालों के इस अनुभव से उत्साहित होने के कारण ही पीपल्स एजुकेशन सोसाइटी की गव²नग बॉडी को लगता है कि अपने काम को विस्तार दिया जा सकता है।

शायद यह पूछा जाए कि कॉलेज खोलने के लिए हैदराबाद संस्थान को ही क्यों चुना

जनताः 15 और 22 सितंबर, 1951