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गया? कारण बेहद आसान है। हैदराबाद संस्थान शिक्षा और उच्च शिक्षा में बेहद पिछड़ा हुआ है। हैदराबाद संस्थान का विस्तार चौरासी हजार वर्ग मील है और जनसंख्या एक करोड़ साठ लाख है। मार्च, 1949 में संस्थान में कुल 17 कॉलेज थे और इन कॉलेजों में पढ़ने वालों की संख्या 7615 थी। इन आंकड़ों की तुलना मुंबई राज्य के आंकड़ों के साथ करें। मुंबई राज्य का विस्तार एक लाख पंद्रह हजार पांच सौ सत्तर वर्ग मील है और जनसंख्या 3.23 करोड़ है। 31 मार्च 1950 के दिन उसके कॉलेजों की संख्या 90 और उसमें पढ़ने वाले छात्रों की संख्या कुल 50356 थी।
हैदराबाद संस्थान उच्च शिक्षा के मामले में कितना पिछड़ा हुआ है यह इन आंकड़ों से पता चलता है। सवाल यह है कि ऐसा क्यों है? मैं ज्यादा गहराई में नहीं जाना चाहता। अगर लगे तो हैदराबाद सरकार को मैं अलग से एक मसौदा विचारार्थ भेजूंगा। इन हालात में हमारे काम के विस्तार के लिए हैदराबाद संस्थान ही सही है, ऐसा हमें लगता है।
शिक्षा के मामले में हैदराबाद संस्थान का पिछड़ापन अगर छोड़ भी दें तो एक और खेदजनक घटना ध्यान खींचती है। वह है शिक्षा से संबंधित छूट में बरती जा रही असमानता। इन स्थितियों का बिल्कुल समर्थन नहीं किया जा सकता। उच्च शिक्षा का जो भी थोड़ा बहुत प्रसार दिखाई देता है वह केवल हैदराबाद शहर में ही है। कुल सत्रह कॉलेजों में से इंटर तक शिक्षा देने वाले तीन कॉलेज अगर छोड़ दें तो अन्य सभी कॉलेजों के संस्थान राजधानी वाले शहर हैदराबाद में ही हैं। 80 लाख जनसंख्या वाले तेलंगाणा में वारंगल में इंटर तक के अन्य तीन कॉलेजों में से एक कॉलेज है। पैंतालीस लाख जनसंख्या वाले मराठी हिस्से वाले औरंगाबाद में दूसरा इंटर कॉलेज है और पैंतीस लाख जनसंख्या वाले हिस्से के लिए कर्नाटक में तीसरा कॉलेज है।
इस कमी को दूर करने के लिए सोसाइटी ने हैदराबाद संस्थान को चुना। औरंगाबाद की जगह संस्थान के तेलंगाना अथवा कर्नाटक में सोसाइटी कॉलेज खोल सकती थी ऐसा शायद कोई कहे। तो, जातीय या भाषाई भावनाओं से हमारी सोसाइटी का कुछ लेना-देना नहीं है। सोसाइटी का प्रमुख उद्देश्य है जहां-जहां भी मौका मिले वहां शैक्षिक सेवा देना। सोसाइटी की इच्छा थी कि मुंबई का सिद्धार्थ कॉलेज चलाने में जैसी सफलता मिली उसी प्रकार की सफलता इस नई कोशिश में भी मिले।
मुंबई के कुछ कुशल अध्यापकों में से कुछ लोगों को यहां ले आने के लिए सोसाइटी उत्सुक थी। लेकिन पता चला कि केवल मराठी बोलने वाले अध्यापक ही राजी-खुशी यहां आने के लिए तैयार हुए और केवल इसी कारण सोसाइटी ने औरंगाबाद में कॉलेज
खोला।
कॉलेज ने जो प्रगति की है उससे कहा जा सकता है कि सोसाइटी द्वारा औरंगाबाद का चुनाव करना योग्य ही था। कॉलेज की प्रगति के बारे में जानकारी देने से पूर्व