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दूसरी मुश्किल फीस से संबंधित है। उस्मानिया विश्वविद्यालय को अपने अधिकार में कॉलेज की फीस तय करने का अधिकार है। उस्मानिया विश्वविद्यालय में कम से कम मानी जाने वाली फीस यानी सालाना 60 रुपये ली जाती है। यह सच है कि, पीपल्स एज्युकेशन सोसाइटी को छात्रों से सालाना 120 रुपयों की फीस लेने की इजाजत उस्मानिया विश्वविद्यालय की ओर से दी गई है। इसके बावजूद नजदीकी क्षेत्र नासिक और खानदेश में चलने वाले मुंबई विश्वविद्यालय के कॉलेजों में ली जाने वाली फीस की तुलना में यह आंकड़ा बहुत कम है। फीस की कमी का संस्थान की प्रजा की आर्थिक स्थिति से कुछ लेना-देना नहीं है। उसकी आर्थिक स्थिति आसपास के संस्थानों की प्रजा की आर्थिक स्थिति से किसी तरह उन्नीस नहीं है।
आय के एक हिस्से के रूप में विश्वविद्यालय छात्रों से प्राप्त होने वाली फीस की ओर नहीं देखती इसलिए उनके लिए इतनी कम फीस रखने से कोई फर्क नहीं पड़ता। पुराने करार (चार्टर) के अनुसार हैदराबाद सरकार सरकारी महसूल को ही विश्वविद्यालय की सभी प्रकार की आय मानती थी। विश्वविद्यालय केवल वसूल करने वाला एजेंट माना जाता था। उसे आय से कुछ लेना-देना नहीं होता था। विश्वविद्यालय की प्राप्ति सरकार से मिलने वाली सालाना ग्रांट ही थी।
तीसरे कारण का संबंध प्रोफेसरों की तनख्वाह के अनुपात से है। उस्मानिया विश्वविद्यालय को अपने अधिकार में निजी कॉलेज के प्रोफेसर वर्ग की तनख्वाह तय करने का हक है। औरंगाबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की तनख्वाह का अनुपात निम्नानुसार है-
पद तनख्वाह रुपयों में
प्रिंसिपाल 1200-1700
प्रोफेसर 800-1500
लेक्चरार 300-800
रीडर 350-800
औरंगाबाद के पीपल्स एज्युकेशन सोसाइटी के कॉलेज के लिए विश्वविद्यालय द्वारा समर्थित तनख्वाह का अनुपात निम्नानुसार है -
पद तनख्वाह रुपयों में
प्रिंसिपाल 500-700
लेक्चरार 250- 400
ज्युनियर लेक्चरार 180-325