234 14-1-1946 क्षमतावान न भी हों तो चलेगा, लोग निष्ठावान होने चाहिएं - सोलापुर - Page 23

4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दुबारा राउंड टेबल परिषद जैसे हालात पैदा हों। मैं आपसी बैर बढ़ने नहीं देना चाहता, अपने समाज का हित चाहता हूं और दोनों राजनीतिक मांगों के सहारे समस्या हल करने की कोशिश की जाए, इसलिए मैंने गांधीजी को पत्र लिखा। तब मेरी सुलह की मांग को नकारते हुए उन्होंने कहा कि - ‘आपके और हमारे दृष्टिकोण में समानता नहीं है।’ मेरे

खत लिखने से पहले यही गांधी, जिन्ना के घर जाकर उनके साथ नजदीकी बढ़ा रहे थे। मैंने सोचा कि अगर गांधह, जिन्ना से मिलते हैं तो मुझसे भी मिलेंगे। गांधी-जिन्ना के बीच कौन-सा समान दृष्टिकोण था_ यह तो कोई राजनीतिक विशेषज्ञ ही बता पाएंगे। राज्य केवल आपके अकेले की कमाई नहीं। वह तो दोनों का प्रयास है, ऐसे में ‘सुई की नोक बराबर इतनी मिट्टी भी पांडवों को नहीं मिलेगी’ कहने वाले दुर्योधन की तरह, गांधी भी मुझसे मिलने के लिए तैयार नहीं हैं। समझौते की बातचीत खत्म होने के बाद कृष्ण ने दुर्योधन से कहा था कि आप अपना पक्ष संभालिए। गांधी जब दुर्योधन की भूमिका स्वीकारते हैं तो अस्पृश्य समाज को भी अपना शौर्य, पौरुषत्व दिखाते हुए इस युद्ध में शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन के उम्मीदवारों को जिता कर गांधी और काँग्रेस को डंके की चोट पर बता देना चाहिए कि आप अपना पक्ष संभालिए हम अपना पक्ष संभाल लेंगे।

भावी संविधान तय करते समय अछूतों का पक्ष हम ही मजबूती के साथ रखेंगे। इस बार के इलेक्शन सीधेसादे नहीं हैं। शिक्षकों का वेतन, खेती पर लगान कम करना, बूंदी के लड्डुओं का खाना-पाने का साधन नहीं है इलेक्शन। अंग्रेजों के चले जाने के बाद सत्ता किसके हाथ में रहेगी यह भावी संविधान में इस इलेक्शन के जरिए तय करना है।

चुनाव के मौके का फायदा उठाते हुए कई खोखले घोषणा-पत्र जारी हुए हैं। लेकिन उनमें कोई दम नहीं। घोषणा-पत्र में कही बातों पर बाद में अमल नहीं किया गया तो हम अस्पृश्य उनका क्या कर सकते हैं? हम अपना रोना लेकर किसके पास जाएंगे? यह लड़ाई सत्ता की है।

रोटी के लिए किसी का मुंह ताकने की नौबत हमारे समाज पर न आए। पेट पालने की समस्या हल हो, सम्मान के साथ हम जी सकें, इसके लिए सत्ता की जरूरत होती है। वही पाने के लिए हमारी यह लड़ाई है।

गांव का मुखिया या जमींदार अगर पीटता है तब भी अस्पृश्य की शिकायत की कोई सुनवाई नहीं होती क्योंकि पुलिस से लेकर कलक्टर तक सब एक-दूसरे के नाते-रिश्तेदार होते हैं। दीवान भी उन्हीं की जाति का। जीवन भर हमारा समाज क्या गुलामी में ही रहेगा? हमारी लड़ाई, इसीलिए है कि जो अंग्रेजी राज में है वही भावी राज में न हो। जब तक हिंदुओं के हाथ में राजनीतिक सत्ता रहेगी तब तक गुलामी समाप्त नहीं होगी। इस चुनाव में हमारा दलित फेडरेशन वोट की भीख नहीं मांगता। हम चाहते हैं कि हम