280 27-10-1951 मैं नदी की धारा मोड़ने वाले मजबूत पहाड़ की तरह हूं - रामदासपुरा (जलंधर) - Page 230

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नदी की धारा को मोड़ने वाले मजबूत पहाड़ की तरह हूं मैं

जलंधर के बुटान मंडी इलाके के मोहल्ला रामदासपुरा में 27 अक्तूबर, 1951 के दिन पहले आम चुनाव के समय डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण हुआ-

भाइयों और बहनों,

इससे पूर्व भी इस प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन कर उसमें मेरी सहभागिता की उम्मीद आप लोगों ने की थी। लेकिन केंद्र सरकार में मंत्री के पद की जबरदस्त जिम्मेदारियों के कारण और मेरे गिरते स्वास्थ्य के कारण मैं आज से पहले आपके कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाया। इसके लिए मैं पहले ही आपसे क्षमा मांगता हूं। मुझसे यह भी कहा गया है कि मेरा भाषण सुनने के लिए आज से पहले भी कई बार आप यहां इकठ्ठा हुए और आपको निराश होकर लौटना पड़ा। आपको जो तकलीफ हुई, आपको जो निराश होना पड़ा इसके लिए मैं आपसे माफी मांगना चाहता हूं।

आप जानते ही हैं कि पिछले चार सालों से मैं केंद्र सरकार में मंत्री था। भूतकाल में किसी भी मंत्री को जितना काम का बोझ वहन करना न पड़ा हो या भविष्य में किसी भी मंत्री को जितना काम का बोझ वहन नहीं करना पड़ेगा उतना बोझ मुझे वहन करना पड़ रहा था। मैं उस दौरान किसी दौरे पर नहीं जा सका इसकी यही एक वजह है। दूसरी बात यह है कि मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है। अभी भी मैं पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुआ हूं। मेरे स्वास्थ्य ने भी मेरे दौरों की राह में रोड़े अटकाए तीसरा और आखरी कारण यह रहा कि इस देश के हर हिस्से में अस्पृश्य लोग हैं। हर तहसील, जिला और प्रांत का अगर मैं दौरा करता रहा तो चार-पांच सालों में भी वह पूरा न हो। आपके गांव आकर आपसे हार्दिक मुलाकात करूं यह आपका आग्रह मेरे बारे में आपके मन में व्याप्त प्रेम के कारण ही होता है। लेकिन हर जगह जाना मेरे लिए असंभव है। आपमें से हर किसी को आत्मनिर्भर होकर आजाद सामाजिक जीवन जीना चाहिए ऐसा मुझे लगता है।

मैंने अपनी उम्र के 60 वर्ष पूरे किए हैं। सरकारी नौकरी में होता तो मुझे जबरदस्ती अवकाश प्राप्त करवाया जाता। लेकिन यह नियम राजनीति में लोगों पर लागू नहीं होता। ऐसा होता तो अच्छा होता। आजकल तो ऐसा दिखाई देता है कि जिनके पास जीवन-यापन के साधन नहीं हैं और बुद्धिमत्ता भी नहीं है। ऐसे 55 वर्ष से अधिक आयु वाले लोग राजनीतिज्ञ बन कर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं।

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के भाषण. संपादक - मा. फ. गाजरे, खंड 7, पृ. 48-56