280 27-10-1951 मैं नदी की धारा मोड़ने वाले मजबूत पहाड़ की तरह हूं - रामदासपुरा (जलंधर) - Page 231

212 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मेरे राजनीति में आने के कारण हैं, मेरे राजनीति के अखाड़े में उतरे अब 30 से भी अधिक साल गुजर गए हैं। इतने लंबे समय तक राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाला कोई शख्स आज भारत में नहीं है। आम नियम यही है कि खाली समय में राजनीति कीजिए। इन तीस सालों में से आठ साल मैंने केंद्र सरकार के सदस्य के रूप में बिताए हैं। इस क्षेत्र में भी कोई भी मुझ से आगे नहीं निकल पाया है। मेरी इच्छा होती तो शायद कुछ और सालों तक मैं केंद्रीय सरकार का सदस्य बन कर बिता सकता था।

लेकिन, बचपन से ही, जब से होश संभाला है तब से, हमेशा मैंने एक सिद्धांत का अनुसरण किया। वह सिद्धांत था अपने अस्पृश्य बांधवों की सेवा करना। मैं जहां भी रहूं, जिस किसी पद पर रहूं, हमेशा अपने भाइयों के भले के बारे में सोचता और कार्य करता रहता हूं। अन्य किसी बात को मैंने इतना महत्व नहीं दिया है। अस्पृश्यों के हित की रक्षा मुझे करनी ही होगी यही मेरे भूतकालीन जीवन का उद्देश्य और भविष्य में भी यही मेरे जीवन का उद्देश्य रहेगा। लाभ के पद वाली और बहुत बड़ी तनख्वाहों वाली नौकरियां मुझे दी गई थीं लेकिन अपने लोगों की सेवा करना यही मेरे जीवन का उद्देश्य होने के कारण मैंने वे नौकरियां अस्वीकार कीं।

विदेश से अर्थशास्त्र में उपाधि प्राप्त कर लौटने वाला मैं केवल अस्पृश्यों के बीच पहला व्यक्ति नहीं था वरन् पूरे भारत से मैं पहला व्यक्ति था। मुंबई में दाखिल होते ही मुझे मुंबई सरकार ने राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर का पद देने की पेशकश की। अगर मैंने वह नौकरी ली होती तो आज मुझे बड़ी तनख्वाह मिल रही होती। लेकिन मैंने वह नौकरी स्व्ीकार नहीं की। क्योंकि, मुझे पता था कि कोई सरकारी नौकरी स्वीकारने के बाद लोगों की सेवा करने की आपकी इच्छा पर कई सारे बंधन आ जाते हैं। जीवन-यापन चलाते हुए मैं आजादी से जी भी सकूं इसलिए कानून की पढ़ाई के लिए (अपना पेट पालने के लिए जो किसी और पर निर्भर नहीं होता वही व्यक्ति एक-दो सालों के बाद ही) मैं इंग्लैंड गया। जो अपना पेट पालने के लिए किसी और पर निर्भर नहीं रहता वही व्यक्ति सही मायने में आजाद होता है।

बार-एट7लॉ की उपाधि प्राप्त कर इंग्लैंड से लौटने के बाद एक बार फिर मुझे जिला न्यायाधीश के पद का - तीन सालों के अंदर-अंदर हाइकोर्ट के जज के पद पर पदोन्नति देने के आश्वसन के साथ - नियुक्ति का प्रलोभन दिया गया। उस वक्त मेरी माहवार कमाई 100 रुपए तक नहीं थी। बेहद गरीब लोगों के लिए खड़ी की गई एक चॉल के एक कमरे में मैं रहता था। जज की नौकरी बहुत बड़े तनख्वाह वाली थी और अगर मैं उस नौकरी को स्वीकार कर लेता तो जीवनपर्यंत मुझे कभी रुपए-पैसों की कमी नहीं होती। इसके बावजूद मैंने वह पद अस्वीकार कर दिया। क्योंकि, अगर मैं वह नौकरी करता तो अपने लोगों की उन्नति करने और उनकी स्थिति में सुधार लाने का जो काम