280 27-10-1951 मैं नदी की धारा मोड़ने वाले मजबूत पहाड़ की तरह हूं - रामदासपुरा (जलंधर) - Page 233

214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है? हम कभी अपने देश की आजादी के खिलाफ नहीं थे। लेकिन एक सवाल का हमें सीधा जवाब चाहिए था। आजाद भारत में हमारी स्थिति क्या और कैसी रहेगी? मैंने यह सवाल गांधीजी और अन्य नेताओं के सामने रखा। हम जानना चाहते थे उनके स्वराज में हमारी स्थिति क्या रहेगी? क्या हमारे साथ होने वाले अत्याचार रुकेंगे? हमारे बच्चों की शिक्षा का क्या प्रबंध होगा? क्या हमारे लोग भारत के स्वतंत्र नागरिक बनकर जी पाएंगे? हम पर हो रहे अत्याचार और जुल्म क्या रुकेंगे? हमारी महिलाओं की इज्जत क्या सुरक्षित रहेगी? गांधीजी या किसी भी अन्य नेता ने इन सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं दिए हैं और इनके बारे में जो कुछ कहा है वह बहुत बार ना-नुकूर के बाद ही कहा है।

सबसे पहले गोलमेज परिषद् में मैंने यह सवाल सामने रखा और मांग की कि मुसलमान, ईसाई, सिक्ख और अन्य अल्पसंख्यकों की तरह अस्पृश्यों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र होना चाहिए। अस्पृश्यों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र होना चाहिए इस न्यायपूर्ण मांग के लिए गोलमेज परिषद में मेरे देशवासियों की ओर से मुझे समर्थन नहीं मिल पाया। हालांकि अपने लोगों के लिए मैंने राजनीतिक हक प्राप्त किए। उसके बाद जो कुछ हुआ वह सब इस देश के सभी लोग जानते हैं। इतना बताना काफी होगा कि आधुनिक भारत के इतिहास में पहली बार जो हक हमने प्राप्त किए उन राजनीतिक हकों को निरस्त करने के लिए गांधीजी ने आमरण अनशन शुरू किया। अस्पृश्यों के मन में जग रही राजनीतिक आकांक्षाओं से डरकर गांधीजी अस्पृश्यों के विलाफ गए। वह चाहते थे कि अस्पृश्य अपने सवर्ण परोपकारी स्वामी यानी सवर्ण हिंदुओं की दया पर निर्भर रहें। गांधीजी के शब्दों पर विश्वास कर और हिंदू नेताओं के आश्वासन पर भरोसा कर गांधीजी की जान बचाने के लिए हमने अपने हक की बलि चढ़ाई। उसके परिणाम अब आप साफ देख रहे हैं। विश्वासघात और कपट की वह एक दुखद कहानी है। सभी तरह के अच्छे-बुरे मार्गों का अपनाकर काँग्रेस ने अस्पृश्यों को उनके न्यायपूर्ण हकों से महरूम किया है। अस्पृश्य समाज में जिनका सम्मान का स्थान नहीं है ऐसे लोग केवल सवर्ण हिंदुओं के समर्थन से कानून मंडल पर चुनकर जाते हैं। तथाकथित हरिजन काँग्रेस के ही भेदिए हैं। इन हरिजन उम्मीदवारों को टिकट देते हुए काँग्रेस की कसौटी क्या होती है यह मेरी समझ में नहीं आता। साधारणतया किसी भी उम्मीदवार को चुनाव के लिए टिकट देते हुए काँग्रेस उससे पूछती है कि क्या उन्हें देश की आजादी की लड़ाई में कारावास हुआ है? लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि हरिजनों को टिकट देते हुए काँग्रेस यह कसौटी नहीं होती। आरक्षित जगहों पर हरिजनों को खड़ा कर अस्पृश्यों द्वारा हासिल किए गए हक काँग्रेस बड़ी सहजता से धूल में मिला रही है।

काँग्रेस के टिकट पर कई अस्पृश्य विधानसभा में चुन कर गए हैं। इन हरिजन