280 27-10-1951 मैं नदी की धारा मोड़ने वाले मजबूत पहाड़ की तरह हूं - रामदासपुरा (जलंधर) - Page 234

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विधायकों से मैं पूछना चाहता हूं कि पिछले चार सालों में उन्होंने लोगों के लिए क्या किया? पार्लियामेंट में और संविधान समिति में 30 हरिजन थे। अस्पृश्यों के प्रतिनिधि के तौर पर लिए गए इन 30 सदस्यों में से किसी एक ने तो कभी राज्य संविधान पर हुई चर्चा में हिस्सा लिया था क्या? इन हरिजन सदस्यों में से क्या किसी एक ने भी कोई एकाध सवाल पूछा? क्या कोई प्रस्ताव रखा? या फिर क्या कोई बिल रखा? इन हरिजनों के चुप रहने से पार्लियामेंट के कामकाज का विदेशी समालोचक यही निष्कर्ष निकाल लेगा कि भारत में अस्पृश्यों के साथ किसी प्रकार का कोई अन्याय या अत्याचार नहीं होता और उनकी किसी भी तरह की कोई शिकायत नहीं है। ईमानदारी से कहें तो सच इसके बिल्कुल उल्टा है। हमें ऐसे प्रतिनिधि चाहिएं जो हमारे दुखों के बारे में निडरता से विधानसभा में आवाज उठाएंगे। लेकिन काँग्रेस द्वारा नियुक्त किए गए ये अस्पृश्यों के प्रतिनिधि आज्ञाकारी बनकर या तो अपने मालिकों का गुणगान करते हैं या फिर मुंह चुपकर बैठते हैं जबकि पूरे भारत से अस्पृश्यों के साथ होने वाले अत्याचारों, उन्हें उनके हक-बुनियादी जरूरतें न दिए जाने, उनकी बेइज्जती किए जाने, उनके शोषण और उन पर किए जाने वाले अत्याचारों की भयानक घटनाओं की खबरें हमेशा मिलती रहती हैं।

अस्पृश्य लोगों के मसलों में जवाहरलाल नेहरू ने कभी भी दिलचस्पी नहीं दिखाई। आस्था जाहिर नहीं की। पिछले बीस सालों से वे राजनीति के क्षेत्र में हैं। दो हजार से भी अधिक सभाओं में उन्होंने भाषण दिए होंगे। अस्पृश्य लोगों पर होने वाले अत्याचारों के बारे में क्या कभी उन्होंने कुछ कहा है? जहां तक मुझे याद आता है, कभी नहीं। उन पर मुसलमानों को लेकर पागलपन सवार है। उसी रोग के वे मरीज बन चुके हैं। मुसलमानों पर अन्याय हुआ या अन्याय होने के बारे में उन्हें पता चला तो भी वे विचलित हो जाते हैं। भारत के मुसलमानों की रक्षा करने के लिए वे हर तरह की कोशिश करेंगे। मुसलमानों को सुरक्षा देने के खिलाफ मैं नहीं हूं। मेरी राय में मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए। जनसंख्या की अदला-बदली का सही रास्ता नहीं मिल रहा हो तो भारत में रह रहे मुसलमानों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य ही है। लेकिन अल्पसंख्य होने के बावजूद अस्पृश्यों के साथ तुलना की जाए तो वे बेहतर हालत में जी रहे हैं। अस्पृश्य, आदिवासी, अपराधी जनजातियां नाम भी घिनौने हैं। पिछडी जातियां अथवा ईसाई लोगों जैसे अन्य अल्पसंख्यकों को सुरक्षा मुहैय्या कराने का अथवा उनके उद्धार के लिए ठोस कुछ करने के बारे में क्या नेहरू ने कभी सोचा है? काँग्रेस के लोगों में अस्पृश्यों के बारे में प्रेम अथवा सहानुभूति अगर नहीं हो तो काँग्रेस पर लोग कैसे विश्वास कर पाएंगे।

काँग्रेस ने अस्पृश्यों के लिए बहुत कुछ किया यह दुनिया को बताते पं जवाहरलाल नेहरू अघाते नहीं। वे जो बताते हैं वह झूठ कैसे है यह केवल एक उदाहरण से मैं बताता हूं।