216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विभाजन के बाद पाकिस्तान सरकार ने अस्पृश्यों के पाकिस्तान से भारत आने पर पाबंदी लगाने वाला एक फरमान निकाला। कितने ही हिंदुओं ने पाकिस्तान छोड़ा तब भी पाकिस्तान ने उनकी परवाह नहीं की। लेकिन अगर अस्पृश्य देश छोड़ कर जाएं तो मैला ढोने का, सड़के साफ रखने का, मरे जानवरों को उठाने का घृणित काम कौन करेगा? मैंने जवाहरलाल नेहरू से विनति की कि इन लोगों के स्थानांतरण करने पर पाबंदी लगाने वाले आदेश को हटवाने के लिए कुछ कीजिए। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। इस समस्या को उन्होंने दबा ही दिया और पाकिस्तान के साथ जितनी बार बातचीत हुई उस समय उन्होंने इस बात का जिक्र तक नहीं किया. अकेले अपने बल पर जितना कुछ संभव था मैंने किया है। महार बटालियन के वीर सैनिकों ने गंभीर जोखम उठाते हुए मेरी मदद की और पाकिस्तान से कई अस्पृश्य लोगों को ले आए।
ऐसे हालात में हम काँग्रेसी नेताओं के आश्वासन पर विश्वास कैसे करें? अस्पृश्य लोगों के बारे में काँग्रेस का उद्देश्य अगर साफ है तो वे आम सीटों पर अस्पृश्य उम्मीदवार को खड़ा कर अपनी मंशा जाहिर क्यों नहीं करती?
हमसे कहा जाता है कि काँग्रेस के साथ लड़ना शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन के लिए कठिन होगा। यह असल में सफेद झूठ है। इस चुनाव में हम जरूर जीतेंगे इस बारे में मुझे कोई शक नहीं है। जमाना बदल गया है। पिछले चुनावों में हर कोई हमारे खिलाफ था और, काँग्रेस ने ही आजादी दिलाकर देश को स्वतंत्र किया इस प्रकार काँग्रेस द्वारा किए गए प्रचार के कारण उन पर विश्वास कर हर कोई उनके साथ गया। आज क्या हाल हैं? पंजाब काँग्रेस पर बस नजर डालिए। पंजाब में क्या सचमुच काँग्रेस का अस्तित्व है? पंजाब की काँग्रेस मर गई है ऐसा लगता है। उसके दो आधारस्तंभ। डॉ. गोपीचंद भार्गव और श्री भीमसेन सच्चर श्रेष्ठता के लिए आपस में भिड़े हुए हैं। उम्मीदवार तय करने की तारीख सिर पर आकर खड़ी होने के बावजूद आगामी चुनावों के लिए काँग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की सूची अभी मंजूर नहीं की है। जो लोग घर की छत पर खड़े होकर ‘हम एक मां के बच्चे हैं’ का ऐलान कर रहे थे वे ही अब जानी दुश्मनों की तरह आपस में लड़ रहे हैं। भार्गव गुट और सच्चर गुट में अब मेल होना पूरी तरह असंभव है।
पंजाब का मुख्यमंत्री कौन होगा यही एकमात्र सवाल इन नेताओं के सामने है। इन सज्जनों को लोगों की शिकायतों से कोई लेना-देना नहीं है। पंजाब में लड़ाई किसी सिद्धांत के लिए नहीं वरन् सत्ता के लिए है। यही हाल कमो-बेश अन्य कई राज्यों में भी है। घूसखोरी, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद को लेकर कई काँग्रेसी उम्मीदवारों के खिलाफ कई शिकायतें काँग्रेस के दफतर में आ रही हैं। 1947 में काँग्रेस प्रसिद्धि के शिखर पर थी। अब, केवल चार वर्ष के अंतराल के बाद वह एकदम निचले स्तर पर फिसल गई है। दुनिया की राजनीतिक पार्टियों के इतिहास का यह एक अद्वितीय उदाहरण है। काँग्रेस के संदर्भ में ‘काँग्रेस वाला’ और ‘सज्जन’ ये दो शब्द अब परस्पर विरोधी