281 28-10-1951 हमारे सच्चे प्रतिनिधि अगर संसद तथा राज्यसभा में हों तभी वे हमारे हित में लड़ सकेंगे - लुधियाना - Page 242

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उद्देश्य केवल स्वार्थ साधना होता और मुझे अपने समाज के बारे में कोई आस्था नहीं होती। मुझे किसी लाइसेंस या परमिट की जरूरत होती तो ही मैं वहां रहता। लाइसेंस और परमिट पाने वाला आदमी समाजहित की बलि चढ़ाकर ही वैसा करता है। काँग्रेस सरकार में जब मैं था तब यह मेरा अनुभव रहा है।

अंग्रेज अगर चाहते तो वे जब तक यहां थे हमारी उन्नति के लिए कुछ कर सकते थे। लेकिन उन्होंने भी हमारे साथ धोखा किया। अब वह जमाना बीत गया, अब दूसरा जमाना आ गया है। अंग्रेज हमें छोड़ कर चले गए हैं अन्य लोग अब सत्ता में हैं। इस बार अगर हम सतर्क नहीं हुए और आंखें बंद करके बैठे रहे तो हमारा सर्वनाश निश्चित है। आज तक आप लोग जो अत्याचार सहते आए हैं, सह रहे हैं वह आपकी भावी पीढ़ी को सहना न पड़े ऐसा अगर आप चाहते हो तो आपको अभी इस दिशा में कुछ करना होगा। पेड़ लगाने के कुछ समय बाद आपको फल मिलने लगते हैं। मैं आपके मन में यह बात डालना चाहता हूं कि विधानसभा और संसद की आरक्षित जगहें केवल दस वर्षों के लिए ही हैं। भारत में जब तक अस्पृश्यता प्रचलित है तब तक वे आरक्षित रहें ऐसी मेरी इच्छा है लेकिन काँग्रेस के टिकट पर जो हमारे लोग संसद के सदस्य बने उन्होंने भी मेरा विरोध किया। उच्चवर्णियों के बारे में क्या बोलें? कुछ भी न मिलने के बजाय कुछ मिलना बेहतर है यही सोच कर दस सालों तक सीटों के आरक्षण के लिए मैंने सहमति जताई। अपने लोगों के लिए थोड़ा-बहुत कुछ पाया। यह आरक्षण केवल अगले दो चुनावों तक ही लागू है और तब तक काँग्रेस जैसी पार्टियां आपके पास आएंगी और वोट मांगेंगी। इस प्रकार दस सालों का यह समय निकल जाएगा और इस समय को बढ़ाने की मांग करने के लिए आपका कोई आदमी संसद में नहीं होगा। तब आप क्या करेंगे यह मैं आपसे पूछना चाहता हूं। तब क्या ये काँग्रेस वाले आकर उनके टिकट पर चुनाव लड़ने की विनति आपसे करेंगे? निश्चित रूप से नहीं। वे इतने मूर्ख नहीं हैं। वे आप लोगों को मूर्ख बनाना चाहते हैं। आज जो लोग काँग्रेस का टिकट पाने की इच्छा रखते हैं, उस कोशिश में लगे हैं तब उनके मुंह पर ये काँग्रेस वाले थूकेंगे भी नहीं। इसीलिए आप सब लोग इस समस्या पर सोचें। सोचने के बाद ही तय करें कि किसे अपना वोट देना है।

किसी भी पक्ष के पास या तो सत्ता होनी चाहिए या पैसा होना चाहिए। हमारे समाज के पास पैसा भी नहीं है और सत्ता भी नहीं है। हम उच्चवर्णियों की दया पर गांवों में थोड़े-थोड़े लोग रह रहे हैं। बनिया और मारवाड़ी भी सत्ता में नहीं हैं लेकिन उनके पास पैसा है। पैसों के बल पर वे जो चाहें खरीद सकते हैं। इसलिए अपने लिए कुछ करने का यह एक अच्छा मौका आपके पास है। आप अगर संगठित होंगे तो हित संबंधों की रक्षा के लिए आप अपना प्रतिनिधि विधानसभा या संसद में भेज सकते हैं। ऐसा न करने से आपका विनाश होगा। इस झमेले से अपने समाज को बाहर निकालने के लिए