224 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन के ध्वज के नीचे आपको संगठित होना होगा। अपने सच्चे प्रतिनिधि चुनने के लिए हर अस्पृश्य को फेडरेशन की मदद करनी होगी। कई पार्टियां आकर आपसे वोट की मांग करेंगी लेकिन उनकी बातों में आकर गलत रास्ते पर निकल नहीं जाना है।
कुछ दिनों पूर्व जवाहरलाल नेहरू यहां आए हुए थे। कहा जाता है कि दो-तीन लाख लोग उनका भाषण सुनने के लिए यहां इकठ्ठा हुए थे। मैं नहीं जानता कि कितने लोग वहां थे। कल मैं जब जालंधर गया था तब वहां दो लाख से भी अधिक लोग इकठ्ठा हुए थे लेकिन हिंदू और काँग्रेसी अखबारों ने वहां अंदाजन केवल 35 हजार लोग इकठ्ठा हुए थे ऐसी खबरें छापीं। मैं आपसे बस इतना ही कहना चाहता हूं कि काँग्रेस की कोई परिषद हो तो श्रोता बहुत कम हों तब भी वे यही छापेंगे कि सभा में बहुत बडा जनसमुदाय इकठ्ठा हुआ था। पांच होंगे तो पचास लिखेंगे, पचास होंगे तो पांच-सौ, पांच-सौ होंगे तो पांच हजार लिखेंगे और पांच हजार को वे पांच लाख लिख कर छापेंगे। इन अखबारों के द्वारा झूठी जानकारी देने और झूठी आलोचना किए जाने को लेकर मुझे आश्चर्य महसूस नहीं होता। ये अखबार कई सालों से मेरी आलोचना करते आए हैं। इसके बावजूद मेरा शारिरिक और मानसिक विकास हो ही रहा है। बहुत बड़े जमावड़े के सामने भाषण देना मुझे पसंद नहीं है। मैं बस इतना चाहता हूं कि इन हिंदु लोगों से होने वाले अत्याचारों का सामना करने के लिए हमारे लोग संगठित हों। मेरे विचार सुनें इतनी मेरी इच्छा है। फिर वे बहुत बड़ी संख्या में इकठ्ठा हों या छोटी संख्या में, मेरे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है।
हर राजनीतिक दल ने अपना घोषणा-पत्र घोषित किया है। हर पक्ष ने आश्वासन दिए हैं कि अगर वे जीत जाएंगे तो ये करेंगे और वो करेंगे। शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन ने भी अपना घोषणा-पत्र जारी किया है। सबसे पहले काँग्रेस ने अपना मोटा घोषणापत्र जारी किया। लेकिन जब उन्हें अहसास हुआ कि आम आदमी उसे समझ नहीं पाएगा तो उन्होंने उसमें बदलाव किए और उसे छोटा बनाया गया। दिनों-दिन उनका घोषणा-पत्र छोटे से और छोटा होता जाएगा और एक दिन ऐसा आएगा कि काँग्रेस का कोई घोषणा- पत्र ही नहीं रहेगा ऐसा मुझे लगता है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि घोषणा-पत्र में क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए। सभी राजनीतिक दलों को मेरी चुनौती है कि सबसे अच्छा घोषणा-पत्र चुनने के लिए वे एक कमेटी बनाएं। हमारा घोषणा-पत्र ही सर्वश्रेष्ट साबित होगा इसमें मुझे कोई शक नहीं। सभी दलों ने अपने-अपने घोषणा- पत्र में जनता को तरह-तरह के आश्वासन दिए हैं। आश्वासन देना बहुत आसान है लेकिन उन्हें प्रत्यक्ष में उतारना बहुत कठिन है। आप अगर एक बात का आश्वासन दे सकते हैं तो सौ बातों का भी दे सकेंगे। घोषणा-पत्र केवल आश्वासनों की फेहरिस्त नहीं होना चाहिए। देश को जिन समस्याओं से सामना करना पड़ता है उन पर घोषणा-पत्र