282 29-10-1951 देश पर संकट आए तो मुकाबला करने वालों में हम सबसे आगे रहेंगे - पटियाला - Page 246

 227

282

देश पर आए संकट से मुकाबला करने में हम सबसे आगे होंगे

अक्तूबर माह के अंत में बाबासाहेब ने पंजाब का दौरा किया तब पटियाला में 29 अक्तूबर, 1951 में उनका जोरदार स्वागत हुआ। उस वक्त पंजाब दलित फेडरेशन के प्रमुख नेता बापूसाहेब राजभोज, सेठ किसनदास, श्री सुलेख, श्री मिहानसिंह उपस्थित थे। डॉ. बाबासाहेब ने भाषण में कहा .

बहनों और भाइयों,

श्री राजभोज ने आपको बता ही दिया है कि मेरी तबियत ठीक नहीं है। मैं संक्षेप में अपने दल की भूमिका स्पष्ट करता हूं और राजनीति के अखाड़े में उतरने के बाद किस बात का कैसे मुकाबला करना है, यह बताता हूं।

अस्पृश्यों पर अत्याचार करने तथा महत्वाकांक्षाओं को दबाने की प्रथा पर काँग्रेस और सवर्ण हिंदू अगर समय रहते रोक नहीं लगाते हैं तो उन प्रथाओं को खत्म करने के लिए हमें कुछ और तरीके अपनाने पड़ेंगे। समय रहते काँग्रेस को अपनी नीति बदलनी होगी। उन्हें अस्पृश्यों को बढ़ावा देने वाली नीति अपनानी होगी।

यह चुनावी दौर है। इसी में देश के सारे दल और उनके कार्यकर्ता व्यस्त हैं। बेशक चुनाव महत्वपूर्ण होते हैं। कम से कम हमें आगामी चुनाव बेहद महत्वपूर्ण - यानी जिंदगी और मौत का सवाल हैं, इसीलिए इस सवाल पर पूरी तरह सोचना और उचित हल निकालना बहुत जरूरी है।

काँग्रेस सबसे बड़ा राजनीतिक दल है। पिछले 60 सालों से यह दल बना हुआ है। साथ ही आज वह सत्तारूढ़ है। चार सालों तक इस दल ने राज चलाया है। बड़ी शान से इस पार्टी की ओर से लोगों को यह बताया जाता है कि काँग्रेस के अलावा देश और लोगों का कोई भला नहीं कर सकता, इसलिए काँग्रेस को ही वोट देना चाहिए। काँग्रेस एक बार फिर सत्ता में आना चाहती है। गरीबों को निचोड़ खाने वाली काँग्रेस चाहती है कि लोग फिर से चुनें। काँग्रेस के पास किराए के प्रचारक बहुत हैं। इस पार्टी के पास बहुत पैसा होने के कारण ऐसे लोग उनसे पलते भी हैं। उनके जरिए काँग्रेस लोगों पर दबाव डाल सकती है।

इसलिए काँग्रेस में असल में क्या चल रहा है इसकी जानकारी जरूरी है। इकतरफा प्रचार के कारण किसी का नुकसान नहीं होना चाहिए। अनाज और कपड़ों का सवाल काँग्रेस हल नहीं कर पाई है, हम सब जानते हैं। उल्टे, यह अब बेहद मुश्किल सवाल बन गया है।

शरणार्थियों की समस्या को भी सत्तारूढ़ काँग्रेस हल नहीं कर पाई है। इसलिए फिर

जनताः 3 नवंबर, 1951