230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लाभ अगर आप भी चाहते हैं तो, आप अगर अपना संगठन बनाना चाहते हैं तो शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन को मजबूत करना यही एकमात्र मार्ग है।
काँग्रेस के हरिजन मंत्रियों ने लोगों के बीच खुद जाकर प्रचार किया था कि आज की सभा में उपस्थित न रहें। हमारे फेडरेशन द्वारा अगर अस्पृश्यों के हितों के लिए लड़ाई नहीं छेड़ी होती तो क्या यह संभव था? ऐसे हाल में ये मंत्री कहां होते? इन्हें मंत्री किसने बनाया? साफ कहूं तो मैंने बनाया। फेडरेशन ने इन्हें मंत्री बनाया। फेडरेशन ने अगर लड़ाई नहीं छेड़ी होती तो आज ये हरिजन मंत्री भी अपमान और जिल्लतभरी जिंदगी जी रहे होते। इन हरिजन मंत्रियों ने क्या कभी अपनी मां या बहनों की आंखों के आंसुओं को पोंछा है? उनकी जरूरतों की ओर क्या कभी आस्थापूर्वक ध्यान दिया है? उन्हें इंसानियत से भरीपूरी जिंदगी देने के लिए क्या कोई कोशिश की है? काँग्रेस के प्रति ईमानदारी रखने वाले इन मंत्रियों ने केवल अपना उल्लू सीधा किया है। इसीलिए राजकाज चलाने के लिए हमें केवल अपने ही लोग चाहिए। जो अपने बंधुओं पर हुए अत्याचारों के बारे में सवाल पूछेंगे, उनके जीवन में सुख लाने की कोशिश करेंगे, प्राणों के बलिदान देने की जरूरत हो तब भी वे अपने प्राणों की बलि चढ़ा कर ही सही उनके हकों की रक्षा करेंगे। ऐसे लोगों को चुनकर भेजना ही उचित है। ऐसे ही लोगों को लोकसभा में और प्रांतीय एसेंब्ली में चुनकर भेजना चाहिए। वे अपनी बुद्धि गिरवी रख कर काम नहीं करेंगे। अस्पृश्यों के दुखों को आवाज देंगे ऐसे लोग ही लोकसभा में उचित काम कर सकेंगे। अब जो अस्पृश्य मंत्री और सदस्य काँग्रेस के गुलाम हैं। कुत्ते की तरह वे अपने मालिक के जूते चाट रहे हैं। ऐसे लोग अपने बंधुओं के लिए क्या खाक करेंगे?
काँग्रेस में शामिल होने के लिए मुझ पर भी दबाव डाला जा रहा था। लेकिन जो पार्टी मेरे अस्पृश्य बंधुओं का कभी भला नहीं कर सकती उस पार्टी में शामिल होकर क्या मैं भी उनका गुलाम बनूं? यह कभी नहीं हो सकता। इसीलिए मैंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देने के लिए मुझसे किसी ने कहा नहीं और न ही किसी घपले के कारण मुझे इस्तीफा देना पड़ा है। घूसखोरी या अन्य किसी तरह के भ्रष्टचार में मैं कभी पड़ा ही नहीं। ऐसी सरकार में, मैं कभी निष्पक्ष तरीके से जनता की सेवा नहीं कर पाऊंगा यह जब मेरे सामने साफ हो गया तभी मैंने मंत्रीपद से इस्तीफा दिया और यह ठीक रहा।
अभी भी हमें लगता है कि हमारे सवर्ण हिंदू हमारे उद्धार की खातिर अपने अधिकारों का प्रयोग करें। हम और दस सालों तक इंतजार करें और तब भी अगर हमें लगे कि इसमें कोई मतलब नहीं है तो हम अपने हक को पाने के लिए जो अन्य तरीके हमें सही लगेंगे उन्हें अपनाएंगे।
देश पर संकट आए तो हम हमेशा आगे रहेंगे। असल में हम देश के लिए मर मिटते हैं, सवर्ण हिंदू नहीं। वे देश के नाम पर, लोगों के नाम पर खुद मलीदा खा रहे हैं। यह हमेशा का ही अनुभव रहा है। जब सेना में भर्ती का सवाल उठता है तब अस्पृश्य पहले आगे बढ़ता है और अपना नाम दर्ज कराता है। सवर्ण हिंदू लोग ऐसे कैंपों के आसपास