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आजादी को कायम रख सकते हैं। दलित, पीडि़त जनता को सुवी और समृद्ध भी बना सकते हैं इसका मुझे विश्वास है। प्रजातंत्र का यह मार्ग अगर अधूरा और असफल सिद्ध हुआ तो ही हम कम्युनिज्म के बारे में सोचेंगे।
कम्युनिज्म से हाथ मिलाने वालों से, उसके बताए मार्ग पर आगे बढ़ने वालों तथा उनके अनुयायियों से मैं एक सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या उन्होंने इस बारे में सोचा है कि अगर इस देश में कम्युनिस्ट राज आएगा तो इस देश का क्या होगा? बताया जाता है कि शेतकरी-कामगार पार्टी के पीछे पूरा मराठा समाज है और इसीलिए मैं यह
खास कर जानना चाहता हूं। कम्युनिज्म का मतलब है कि अपनी सारी संपत्ति सरकार के नाम करना। न सिर्फ सभी उद्योग, बल्कि पूरी खेती, जमीन, घर सब कुछ सरकार का हो जाएगा। और यह सब तानाशाही राजनीति के तहत अमल में लाया जाएगा। शेतकरी-कामगार पार्टी के पीछे खड़े मराठा समाज को क्या यह स्वीकार है? उनकी जमीन, उनकी खेती, उनके बागान, उनके घर-बार सब अगर सरकार के हो जाएंगे तो क्या यह उन्हें चलेगा?
प्रजातंत्र में ऐसा होना संभव नहीं। इसीलिए यहां तानाशाही की स्थापना की जाएगी। विधानसभाओं को नेस्तनाबूत करके प्रजातांत्रिक राजनीति को खत्म कर कम्युनिस्ट राजनीति यह करेगी। जो लोग ‘दाभाडी प्रबंध’ हमारा प्रण है कहने वालों के लिए अब यह प्रबंध गले के रोड़े जैसा लगने लगा है। शेतकरी-कामगार पार्टी के नेताओं के लिए अब इस रोड़े को निकाल फेंकना मुश्किल हो गया है। इस रोड़े को निकाल फेंकना राजनीतिक बेईमानी करने जैसा है ऐसा उन्हें लगता है। लेकिन कभी न कभी इस पार्टी को यह राजनीतिक रोड़ा निकाल कर फेंकना ही पड़ेगा। उम्मीद करते हैं कि ज्योतिबा के अनुयायी कहलाने वालों को जल्द ही पता चलेगा कि कम्युनिज्म की राह सही नहीं है।