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मैंने केवल उस पर हस्ताक्षर किए! (लोगों की हंसी की आवाज) ड्राफिंटग कमेटी में जो मेरे साथ सदस्य थे वह कितने दिन उपस्थित थे और कितने दिन लापता थे यह मैं आपको बता सकता हूं। आखिर बचे मैं और मेरी प्रमुख सचिव। कुछ लोगों की कहीं और नियुक्तियां हुईं। जब कभी मुझे अपनी आत्मकथा लिखने की फुर्सत मिलेगी तब मैं ये सारी बातें विस्तार से लिखूंगा। मैंने जब काँस्टीट्यूएंट एसेंब्ली में आखिरी भाषण दिया तब यह जानकारी इकठ्ठा की। मैं हाजिरी भी लेने वाला था लेकिन अपने सहयोगियों पर आरोप लगाना असभ्यता सूचक होता इसलिए अपने भाषण में मैंने वह परिच्छेद हटाया।
हमारी संविधान समिति में अस्पृश्यों की ओर से दो महत्वपूर्ण मुद्दे थे-
(1) राजनीतिक सुरक्षा - यानी कि, अस्पृश्यों के लिए आरक्षण होना चाहिए।
(2) कानूनन सरकारी नौकरी की सुविधा। ये दोनों मुद्दे विवादित साबित हुए।
खींचतान कर जैसे-तैसे आरक्षित जगहों के लिए दस सालों की मोहलत पाई। इससे कुछ लोगों के पेट में दर्द उठा। काँग्रेस वालों ने दी गई रियायतें वापिस लेने के लिए आंदोलन शुरू किया। इससे हुआ बस यही कि मुसलमान और ईसाइयों की आरक्षित जगहें गईं। लेकिन इससे अलग ही संकट हमारे सामने खड़ा हुआ। मांग कर पाए इन दस सालों में हद से हद तीन चुनाव होंगे, आगे क्या? यह सवाल बेताल की तरह डराने लगा।
काँग्रेस के लोगों से मैं पूछता हूं कि क्या आप यह आश्वासन दे सकते हैं कि आने वाले दस सालों में अस्पृश्यता का निर्मूलन हो ही जाएगा? सारे पुराने भेदभाव खत्म होकर सभी एक समाज के अंग बनेंगे? दस सालों में अगर आप में हमारा उद्धार करने की ताकत नहीं है, हमारे ऊपर होने वाले अत्याचारों को रोकने की ताकत नहीं है तो मैं पूछता हूं कि आरक्षित जगहों की रियायत दस सालों में वापिस क्यों लेना चाहते हो? दस सालों का आरक्षण भी काँग्रेस अगर नहीं देती तो उसकी हालत पीतांबर पहनी (अबला) औरत का भरी सभा में वस्त्रहरण करने वालों जैसी होती और इसी डर के कारण काँग्रेस ने इतनी मोहलत तो दी।
नौकरी की रियायत से पहले मियाद की सीमा नहीं थी लेकिन मुंशी के पेट में दर्द होने लगा। अस्पृश्यता के खत्म होने तक रियायत न देने की विनति करते हुए काँग्रेस के कुछ सदस्यों ने अध्यक्ष के नाम अर्जी भेज दी। सुझाव रखा गया कि इस धारा पर फिर विचार हो। असल में मेरी समझ में यह नहीं आ रहा था कि इस धारा का और काँग्रेस का संबंध ही क्या है! काँग्रेस में इस मुद्दे पर जोरदार बहस हुई आखिर मैंने जब इस्तीफा देने की बात कही तब उस धारा को वैसे ही रहने दिया गया।
इसमें एक और बात का इंतजाम मैंने कर रखा है। संविधान की एक धारा के अनुसार अस्पृश्य और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए सरकार एक अधिकारी