286 22-11-1951 इकतरफा राजनीति कभी सफल नहीं हो सकती - परेल (मुंबई) - Page 263

244 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की नियुक्ति करे और वह इन जमातों पर होने वाले अत्याचारों की रिपोर्ट संग्रहित कर उसे पार्लियामेंट में प्रस्तुत करे।

मुझे लगा था कि इस जगह पर एक अस्पृश्य की नियुक्ति होगी। क्योंकि जैसे कि तुकोबा (संत) जैसा कहते हैं . ‘कळर्वैंयाची याती आणि लाभाविन प्रीती’ (सजातीय से अपनापन ज्यादा होता है, भला करने में अपना लाभ नहीं देखा जाता) तनख्वाह पर किराए के आदमी को रख कर क्या होगा? इस काम के लिए तो अस्पृश्य की ही नियुक्ति की जानी चाहिए। आज अस्पृश्यों में ऐसे अधिकारी का मिलना कठिन नहीं। जिसकी इस पद पर नियुक्ति हुई है उसके बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है। इसके बावजूद एक आशंका है कि अस्पृश्यों के जीवन की सच्ची रिपोर्ट काँग्रेस सरकार क्या उस अधिकारी को प्रकाशित करने देगी? कौन किस प्रकार परेशान करते हैं यह कभी भी स्पष्ट नहीं होगा।

काँग्रेस सरकार अस्पृश्यों को रियायतें देकर देखना चाहती। लेकिन काँग्रस यह सब क्यों करने लगी? अस्पृश्यों के दुख से उसका दिल कैसे पसीजेगा?

इससे पूर्व अंग्रेजों के शासन के दौरान मैं एक्जीक्यूटिव काउंसिलर और मजदूर मंत्री था। कई प्रमुख विभागों का अनुभव मेरे पास था। दोनों सरकारों के कामकाज का अनुभव मेरे पास है। इसीलिए मैं दोनों शासकों की शासन पद्धतियों की तुलना कर सकता हूं। यह बस कहने वाले किस्से नहीं हैं। मैं खुद इन किस्सों का हिस्सा रहा हूं। काँग्रेस राज में अस्पृश्यों का बहुत बुरा हाल हुआ।

उनकी बेहद उपेक्षा की गई। वे हर बार हमारे लोगों को प्रलोभन देकर खरीदने की कोशिश करते थे। इस्तीफा देते समय लिखे पत्रक में मैंने इन बातों का विस्तार से जिक्र किया है। इतना ही नहीं मंत्री था तब भी दिल्ली की एक सभा में काँग्रेस सरकार पर सार्वजनिक तौर पर मैंने यह आरोप लगाया था।

मेरा प्रमुख आरोप था - अस्पृश्यों को राजनीतिक रियायतों का उपभोग काँग्रेस ने करने नहीं दिया। मेरे इस आरोप का जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री नेहरू को आज तक फुर्सत नहीं मिली है। मेरे इस्तीफे में मैंने इन आरोपों को एक बार फिर रखा लेकिन एक-दूसरे का पत्राचार पार्लियामेंट में पढ़ कर सुनाने के अलावा और अधिक कुछ कहने का साहस जवाहरलाल नेहरू ने नहीं दिखाया। जवाब देने के लिए उनके पास बहुत समय था। आगे आठ दिन के बाद काँग्रेस का अधिवेशन हुआ। उन्हें कई बार बोलने का मौका मिलने के बावजूद मेरे कथन का उचित जवाब नहीं दिया उन्होंने बल्कि मेरे सवाल टाल दिए। मैंने जो कहा उसमें सत्य के अलावा कुछ नहीं।

अंग्रेज सरकार ने भी अस्पृश्यों के लिए कुछ खास नहीं किया। मुस्लिम, ईसाई और