286 22-11-1951 इकतरफा राजनीति कभी सफल नहीं हो सकती - परेल (मुंबई) - Page 264

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एंग्लो इंडियन लोगों पर ही उनकी कृपादृष्टि थी। 1942 में मैं जब भारत सरकार का काउंसिलर हुआ तब उनसे पहला सवाल यही पूछा कि इस प्रकार का भेदभाव क्यो? अंग्रेजों ने कोई बहाने बनाए बिना अपनी जिम्मेदारी कबूली। लेकिन काँग्रेस सरकार को कहकर भी बात समझ नहीं आई। उस समय अन्य जातियों की तरह अस्पृश्यों की पढ़ाई के लिए अंग्रेज सरकार ने तीन लाख रुपए मंजूर किए।

आगे अंग्रेज सरकार का मैं जब मंत्री बना तब इस रकम में इजाफा किया गया और उसमें अन्य आदिवासी जनजातियों का समावेश किया गया। अस्पृश्यों की असली उन्नति क्लर्की में नहीं है। असली उन्नति पानी हो तो उच्च शिक्षा की जरूरत है। सादी पढ़ाई कर क्लर्की करने में कोई फायदा है? क्लर्क अपनी जिंदगी में क्या कर सकता है? वह अपने समाज के लिए संविधान नहीं लिख सकता। उच्च शिक्षा लेकर बना व्यक्ति ही समाज में आमूलचूल और व्यावहारिक बदलाव ला सकता है? इसके लिए महत्वपूर्ण पद अस्पृश्यों को कब्जा करना होगा। उन्हें मौके के पद मिलने चाहिए। ऐसे छात्रों को विदेशों में शिक्षा पाने के लिए भेजने पर तीन लाख रुपया खर्च किया जाता था। मैं काउंसिलर था तब 20-30 छात्र इसका फायदा उठा सके। लेकिन आगे चल कर 1946 से उच्च शिक्षा पाने के लिए अस्पृश्यों को विदेश भेजना बंद हुआ! इस प्रकार काँग्रेस के कार्यकाल में अस्पृश्यों की शिक्षा का अंकुर तोड़ दिया गया।

दिल्ली सचिवालय में अस्पृश्य चपरासी भी नहीं थे! एक-दो क्लर्क थे। उन्हें चपरासी पानी तक नहीं देते थे। कुछ अस्पृश्य चपरासियों का मैंने इंतजाम किया लेकिन वहां का जमादार उन्हें रात की शिफट देकर परेशान करने लगा। मैं वहां गया तब मैंने 24 या 25 प्रतिशत नौकरियां आरक्षित करवा दीं। लड़ाई की ‘बेवीन बॉइज’ योजना की तरह कुछ लोगों को पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजा जाता उसमें एक भी अस्पृश्य युवक नहीं होता था।

मुझसे पहले अन्य समाज के 500 युवकों को यह मौका मिला था। आगे 12.5 प्रतिशत अस्पृश्य युवकों को मौका मिलने लगा और अस्पृश्यों के करीब 100 बच्चे इसका लाभ ले पाए। उस समय तीन अस्पृश्य एक्जीक्यूटिव इंजीनियर्स की सेवाएं ली गईं लेकिन आगे चल कर यानी काँग्रेस के कार्यकाल में एक भी अस्पृश्य को ऊंचा पद मिला नहीं! (शेम! शेम!)

काँग्रेस सरकार ने अस्पृश्यों के लिए कुछ नहीं किया। दिल्ली की एक सभा में जब मैंने यह कहा तो होम मेंबर मिस्टर राजगोपालाचारी ने पार्लियामेंट में मेरे सारे आरोप झूठे होने की बात कही। लेकिन आगे उनका मन ही उन्हें कचोटने लगा। इसलिए उन्होंने अस्पृश्यों की नौकरियों के बारे में जानकारी पाने के लिए एक सर्कुलर निकाला। उसमें उन्हें सभी स्थानों से न में ही जवाब मिला होगा। काँग्रेस अस्पृश्यों का क्या और कितना भला कर सकती है इसका यह मजबूत सबूत नहीं है तो और क्या है?