246 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विभाजन के बाद हिंदू-मुसलमानों के रेले चले थे। तब पाकिस्तान ने उच्चवर्णीय हिंदुओं को जाने दिया। लेकिन अस्पृश्यों की हालत पिंजरे में रखे जानवरों-सी हो गई। उन पर लगातार असहय अत्याचार होने लगे। काँग्रेस सरकार ने अस्पृश्यों को भारत में ले आने के लिए रत्ती भर कोशिश नहीं की। उस वक्त महारों की पलटनें पाकिस्तान में थीं। आयु. भाऊराव गायकवाड़ और आयु. रमेशचंद्र जाधव को भेज कर इस महार पलटन के सहयोग से एक-एक अस्पृश्य महिला और पुरुष को हम हिंदुस्तान में लगभग
खींच कर ले आए। इस बारे में मेरे मन में दुःख होता है इतना ही नहीं तो काँग्रेस के लिए घृणा पैदा होती है। जो अस्पृश्य आ नहीं पाए उन्हें मुसलमान होना पड़ा। मैं बस यह पूछना चाहता हूं कि क्या यह काँग्रेस की उदारता का सबूत है? पूर्व पंजाब से गए शरणार्थियों को भारत में और सिक्ख हिंदुओं को, कुछ अनुपात में कम से कम जमीनें तो दी गईं। लेकिन अस्पृश्य शरणार्थियों को क्या मिला? पत्थर? कुछ शरणार्थियों ने राजघाट के सामने भूख हड़ताल की। लेकिन अखबार वालों ने या काँग्रेस वालों ने उनकी सुध नहीं ली। सब कुछ वर्णन करना हो तो महाभारत बनेंगे।
काँग्रेस के लोगों को मानना पड़ेगा कि चार सालों में मंत्री था तब मैंने कोई बेइमानी नहीं की। बीमार होने के बावजूद अपने खून की हर बूंद मैंने सरकार के कामों पर खर्च की। (तालियों की गड़गड़ाहट) उनकी अंदरूनी लड़ाइयों में मैंने हिस्सा नहीं लिया और उनके बारे में मन में कोई गांठ भी नहीं बांधी। चार सालों के अनुभव के बाद मैंने सोचा कि इस पार्टी में रह कर या इसका मंत्री बन कर मैं एकाध सवाल तक नहीं पूछ सका। अब मुझे अपना अलग रास्ता बनाना पड़ेगा, यही सोच कर मैंने इस्तीफा दिया। (जय भीम! का नारा। तालियां।)
इतने सालों के अनुभव से एक विचार पक्का हुआ और वह यह कि हर किसी को अपना उद्धार खुद करना पड़ता है। चिडि़या और उसके बच्चों की स्कूल में पढ़ी कहानी आपको याद होगी। वही कहानी यहां लागू होती है। जो अपने खेत की कटाई करना चाहता है उसे खुद फैसला करना होता है, निश्चय करना होता है और काम में लग जाना पड़ता है। (तालियों की गड़गड़ाहट) हमें अगर मानवीय अधिकार पाने हों तो अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। इसीलिए मैं काँग्रेस की राजनीति छोड़ कर फेडरेशन की लड़ाई का बिगुल फूंक रहा हूं। (तालियों की गड़गड़ाहट) कांग्रेस के साथ मैं रहा लेकिन कभी भी उनकी गुलामी नहीं की मेरी राजनीति स्वभिमान और आत्मसम्मान की ही रही।
आज की राजनीति में किसी एक पार्टी के साथ हाथ मिलाना पड़ता है। सौ में अस्पृश्य नौ हैं या दस हैं। ऐसी हालत में हमें सुलह करनी पड़ेगी। मिलजुल कर की राजनीति काम आ सकती है। अकेले की राजनीति सफल नहीं हो सकती। सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को यकीन होना चाहिए कि हमारे लोग इस सुलह के लिए राजी होकर चुनाव