288 25-11-1951 प्रजातंत्र में विपक्षी दल की बहुत जरूरत होती है - दादर (मुंबई) - Page 269

250 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अपने साथ क्यों नहीं रखी? मैंने जो परिपत्र निकाले थे, समय-समय पर उन्हें खत भेजे थे वे उनके पास होंगे ही। मेरे पास उनकी प्रतियां तो हैं ही। इसलिए मेरा नेहरू से इतना कहना है कि उनमें जो सवाल उपस्थित किए गए हैं उनका वे जवाब दें।

मेरा दूसरा आरोप उनकी विदेश नीति को लेकर है। मंत्रिमंडल में था उस दौरान मैंने इस विषय में कुछ नहीं कहा ऐसा नेहरू का कहना है। पहली बात तो यह कि 15 अगस्त, 1947 से लेकर 26 जनवरी, 1950 तक संविधान के काम में मैं व्यस्त था। इसलिए उस दौरान नेहरू के साथ विदेश नीति पर चर्चा करने के लिए मुझे समय ही नहीं मिला और उस समय मैंने नेहरू के साथ बातचीत नहीं की इसलिए आज इस विषय में मेरा कुछ कहना गलत कैसे हो जाता है? ठीक है, उस वक्त मेरा इस बारे में बात न करना गलत होगा, लेकिन उसे आधार बना कर आज जो मुद्दे मैंने उठाए हैं उन्हें आप दरकिनार नहीं कर सकते। मैंने उसी समय यह बात क्यों नहीं उठाई या उसी वक्त मैंने इस्तीफा क्यों नहीं दिया यही अगर जवाहरलाल नेहरू सुझाना चाहते हैं तो मैं उन्हें यह बता दूं कि मंत्रियों को तारतम्य से बड़े-बड़े निर्णय लेने पड़ते हैं। हर मुद्दे पर अगर इस्तीफे देने पड़े तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी।

मतभेद के बावजूद मैं मंत्रिमंडल में रहा, क्योंकि मुझ पर राष्ट्र का संविधान निर्माण करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी। मेरे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण कार्य था। मेरी कर्तव्यबुद्धि मुझसे कह रही थी कि उस जिम्मेदारी को निभाना। उस काम को लात मार कर बाहर निकल जाना चाहिए कहने वाले शख्स को पागल ही कहना पड़ेगा।

इसीलिए मैं कहता हूं कि इस प्रकार हास्यास्पद बातें कहने के बजाए कश्मीर का सवाल या फिर विदेश नीति के बारे में मेरे वक्तव्यों को कसौटी पर कस कर देखिए, उनके जवाब देने की कोशिश कीजिए।

नेहरू यानी काँग्रेस यह केवल भ्रम है। नेहरू सपने देखने वाले और भोले हैं। काँग्रेस वाले भी नेहरू के साथ नहीं हैं इस बात के कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। काँग्रेस के अध्यक्षीय चुनाव के लिए टंडन के खिलाफ कृपलानी के बीच का मुकाबले का असली रूप पटेल के खिलाफ नेहरू का था। पहले नेहरू ने शंकरराव देव को हाथ में वरमाला लेकर खड़े रहने के लिए मनाया। फिर जब देखा कि इस वर के साथ ब्याहने के लिए कोई दुल्हन नहीं मिलेगी तब कृपलानी को खड़ा किया। आखिर कृपलानी भी हार गए। यानी यह नेहरू की ही हार थी। सरदार पटेल की मृत्यु के बाद नेहरू ही काँग्रेस के इकलौते नेता बन कर रहे।

इसके बावजूद काँग्रेस नेहरू के पीछे आकर खड़ी नहीं हुई। बेंगलोर काँग्रेस में नेहरू के हाथ में सारी सत्ता सौंपने की सूचना उन्हीं के एक दिल्ली के दोस्त ने दी। हालांकि उसे समर्थन देने के लिए भी कोई नहीं मिला। नेहरू द्वारा इस्तीफा देने की धमकी दिए