235 15-2-1946 स्वराज्य के लिए मेरा कतई विरोध नहीं, परंतु स्वराज्य में हमें भी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए - दहिवडी (सातारा) - Page 27

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स्वराज्य के लिए मेरा बिलकुल विरोध नहीं, हां, स्वराज्य में हमें

भी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए

(दहिवडी (सातारा) दिनांक 15 फरवरी, 1946)

अध्यक्ष महोदय, भाइयों और बहनों,

आज मैं यहां दिल्ली से करीब 1000 मील की यात्रा कर पहुंचा हूं। यह मौका उतना ही महत्वपूर्ण है। चारो ओर अलग-अलग पार्टियों की चुनावी गहमागहमी शुरू है, लेकिन मेरे और गांधी के बीच के झगड़े की बात भारत के अखबारों में बार-बार उछाली जा रही है। यह झगड़ा पिछले 25 वर्षों से यानी सन 1920 से चल रहा है। आप लोग सोचेंगे कि यह झगड़्ा किस बात के लिए है? गांधी का तिलक के साथ झगड़ा था। गांधी का गोखले के साथ भी झगड़ा था। गांधी का सर चिमणलाल सीटलवाड के साथ भी झगड़ा था। अब बाकी झगड़े खत्म हो गए लेकिन मेरा और गांधी का झगड़ा अब भी जारी है।

मैं एक दरिद्र परिवार में जन्मा हूं। बडी मेहनत और लगन के साथ मैंने पढ़ाई की। आगे बड़ोदा सरकार की मदद से विलायत जाकर उपाधियां प्राप्त कीं। फिर नौकरी की। दो साल बाद नौकरी छोड़ कर फिर विलायत गया और बैरिस्टर तथा डी एससी की उपाधियां हासिल कीं। तब से समाजकार्य और व्यवसाय दोनों मैं बड़ी ईमानदारी से करता आया हूं। बैरिस्टर की पढ़ाई जब मैंने शुरू की थी तब हाईकोर्ट के सभी वकील ब्राह्मण और सभी सॉलीसिटर्स गुजराती थे। उसी वक्त गांधी के पास जाकर मैं अपने लिए कुछ मांग सकता था। सम्मान, केसेस और रुपया-पैसा भी पा सकता था। औरों की तरह ही मेरा निजी विवाद होता तो वह मिटा कर मैं गांधी की शरण में जा सकता था। लेकिन गांधी और मेरे बीच का विवाद अभी तक मिटा नहीं है। इसकी वजह यह है कि मैं गांधी से अपने लिए कुछ भी मांगना नहीं चाहता। मैं अपनी बुद्धि, अपने पुरुषार्थ तथा अपने बल के सहारे जीवन बिता रहा हूं। गांधी से मैं जो मांग रहा हूं वह आप लोगों की तरफ से और जो न्याय है वही मांग रहा हूं। गांधी के साथ मेरा यह झगड़ा अपने पूरे समाज की ओर से है और समाज के उज्जवल भविष्य के लिए है।

गरुड़ः 10 मार्च, 1946