235 15-2-1946 स्वराज्य के लिए मेरा कतई विरोध नहीं, परंतु स्वराज्य में हमें भी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए - दहिवडी (सातारा) - Page 28

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आजकल तो सब लोग स्वराज की मांग कर रहे हैं, लेकिन सोचिए कि स्वराज किसका? स्पृश्यों से हमारा सवाल है कि आपका राज हम पर ही क्यों है? क्या हमें भी स्वराज और न्याय तथा अधिकार नहीं मिलने चाहिएं? हिंदुओं का स्वराज कहें तो शुद्ध पेशवाई! पेशवाई भी स्वराज ही था ना? उसमें हम पर अनगिनत जुल्म ढाए गए। अछूत व्यक्ति का थूक रास्ते पर ना गिरे, इसलिए उसके गले में मिट्टी का मटका बांधा गया और उसके चलने पर मिट्टी पर होने वाले उसके पैरों के निशान से छुआछूत न फैले इसके लिए उसकी कमर में पीछे झाडू लटकाई गई। पहचान के लिए उसके गले में काला धागा बांधा गया। दोबारा ऐसी स्थितियां पैदा न हों, इसीलिए मैं संघर्ष कर रहा हूं।

स्वराज से मेरा बिल्कुल विरोध नहीं है, लेकिन उस स्वराज में हमें भी हिस्सा चाहिए। अधिकार की जगहों, मौके की जगहों पर हमारे लोगों का भी हक होना चाहिए। राउंड टेबल काँन्फरंस में अलग चुनाव क्षेत्र के लिए मैं लड़ा। मेरा आग्रह था कि स्पृश्यों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि हमें नहीं चाहिए। आखिर मेरी जीत हुई, मैंने अलग चुनाव क्षेत्र हासिल किया, लेकिन इससे गांधी के पेट में दर्द होने लगा। अस्पृश्यों को स्वाभिमान के जो हक मिले उन्होंने यरवदा जेल (पूना), में आमरण अनशन किया और हमारे हक हमसे छीन लिए। इस कारण हमें बहुत कम हक मिले। हमारे किले की दीवार को उन्होंने दरकाया, अब उस दरार को हमें संगठन का चूना-मिट्टी भर कर फिर जोड़ना होगा। सरकारी अधिकारी हमारे हों, मंत्री हमारे हों, केंद्र सरकार में भी हमारे मंत्री होना जरूरी हैं। सात प्रांतों में काँग्रेस के मंत्रिमंडल बने, लेकिन गांधी का नजरिया नहीं बदला और न उनका मन पलटा। अभी हाल में गांधी मद्रास के दौरे पर गए थे। वहां किसी ने उनसे पूछा कि आपके और अस्पृश्यों के बीच मनमुटाव क्यों है? तब सीधा सरल जवाब देने के बजाय गांधी ने टालमटोल वाला जवाब दिया और कहा कि अंग्रेजों ने इन्हें अधिकार की लत लगाई। मराठा, मुसलमान, ईसाई, एंग्लो इंडियन को नौकरियां दी जाती हैं उसमें गांधी को कोई आपत्ति नहीं, लेकिन देखा यही गया है कि अस्पृश्यों को नौकरियां दी गईं तो उन्हे कष्ट होने लगता है।

हमारे लिए ये चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हैं। अंग्रेज हमारी सत्ता छीन कर लोगों को सत्ता और संविधान बनाने के अधिकार देने वाले हैं। इसके लिए एक संविधान समिति बनाई जाने वाली है। हमारे विधायक वहां जाकर प्राप्त संविधान अधिकारों को सतत जारी रखेंगे। हमें ऐसे लोग चाहिएं जो बिना किसी लागलपेट के नौकरियां, शिक्षा, प्रतिनिधित्व, सत्ता, अलग अस्तित्व, उपनिवेश आदि मांगें और उनके सामने रखें। स्पृश्यों की अंजुली से पानी पीने वाले लोग हमें नहीं चाहिए। काँग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले लोग अगर बिना किसी की परवाह किए हमारी मांगें रखेंगे तो मैं उन्हें भी समर्थन दूंगा, लेकिन वे लोग स्पृश्यों के गुलाम हैं। अस्पृश्यों के हित की ओर ध्यान दिए बगैर अपने स्वार्थ की सोचने वाले हैं। हम अगर उन्हें हराते हैं तो बहुत अच्छा ही होगा। धनवान अपने कुत्ते को जिस