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सच्चाई को दरकिनार कर कृतज्ञ रहने को मैं मानवीय
व्यक्तित्व की हत्या मानूंगा
‘‘चुनाव प्रचार का एक बेहतरीन भाषण बाबासाहेब ने सोमवार दिनांक 26 नवंबर, 1951 के दिन शाम सर कावसजी जहाँगीर हॉल में आयोजित सार्वजनिक सभा में दिया। सभा के अध्यक्ष थे पुरुषोत्तमदास त्रिकमदास। इस समय बाबासाहेब आंखें और घुटनों की बीमारी से परेशान थे। आंखों पर पट्टियां लगा कर दो दिनों से आंखें बंद रखी हुई थीं। सभा में वह आए तब आंखों पर पट्टियां बंधी थीं और ऊपर से काला चश्मा पहना हुआ था। दो-तीन लोगों के कंधों पर अपना भार डाल कर। सभी समाजवादी और फेडरेशन के लोगों ने उनसे आग्रह किया कि वे बैठ कर भाषण दें। लेकिन बाबासाहेब ने खड़े रह कर ही भाषण दिया। वह खड़े हुए तब सभा में तालियों की गड़गड़ाहट हुई। हॉल के बाहर हजारों दर्शक खड़े थे उन्होंने भी तालियों की बौछार की। दवाई की गोलियां खाकर बाबासाहेब ने भाषण की शुरुआत की। साफ-सुथरे ढंग से राजकाज चलाना कैसे जरूरी है और ऐसा राजकाज चलाने में कांग्रेस पार्टी की सरकार कैसे असमर्थ है, और इसीलिए जनता दूसरी पार्टी को सत्ता पर ले आए आदि मुद्दे उन्होंने तर्क और प्रमाणों के साथ सुनाकर बाबासाहेब ने दर्शकों को डेढ घंटों तक बांधे रखा। उनका भाषण सुनने के लिए समाज के सभी स्तरों के लोग, कानूनविद्, अमीर, व्यापारी, समाजवादी, साम्यवादी और अन्य नागरिक उपस्थित थे। अस्पृश्य उम्मीदवारों की उपस्थिति तो अनगिनत थी। भाषण पूरा हुआ तब श्रोता उनके भाषण की तारीफ करते हुए ही हॉल से बाहर निकले।’’ ख्1,
डॉ. बाबासाहेब ने अपने भाषण में कहा-
बहनों और भाइयों,
स. का. पाटील अपने मित्रों से यह कहते फिर रहे हैं कि मेरे कहने पर अम्बेडकर को पहले मंत्रिमंडल में स्थान मिला और अब वे कृतघ्न होकर काँग्रेस और मंत्रिमंडल की आलोचना कर रहे हैं। सभा की शुरुआत में एक श्रोता ने मुझसे यह सवाल पूछा था कि क्या यह जानकारी सच है? असल में, मुझे काँग्रेस के मंत्रिमंडल में कैसे स्थान मिला यह एक बहुत ही आश्चर्य की बात है। क्योंकि संविधान सभा के सभी दरवाजे इतना ही नहीं खिड़कियां और दरारें तक मेरे लिए बंद थे। काँग्रेस वालों की प्रतिज्ञा थी कि हम किसी भी और व्यक्ति को संविधान सभा में आने देंगे लेकिन डॉ. अम्बेडकर
- डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर चरित्रः चां. भ. खैरमोडे, खंड 10वां, पृ. 280, 281 और 283