289 26-11-1951 सच्चाई को दरकिनार कर कृतज्ञ रहने को मैं मानवी व्यक्तित्व की हत्या मानूंगा - मुंबई - Page 273

254 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

को नहीं। लेकिन मैं बंगाल से प्रचंड बहुमत से विजय पाकर संविधान सभा में शामिल हुआ। मेरी हालत शेर की मांद में फंसे जानवर जैसी थी। मैं किसी से बात नहीं करता था। केवल एक बार मैंने भाषण दिया।

छह महीनों तक ऐसा ही हाल रहा। आगे एक दिन संविधान सभा का कामकाज पूरा होने के बाद अकस्मात् नेहरू ने मुझे अपने कमरे में बुलाकर पूछा कि क्या आप मंत्रिमंडल में शामिल होंगे? मैंने सभी पहलुओं पर गौर कर और अपने सहयोगियों की राय लेने के बाद यह सोच कर मंत्रीपद स्वीकारा कि सहयोग देने का यह अच्छा मौका है।

आगे सरदार पटेल और राजाजी दोनों कहने लगे कि हमारी सूचना के कारण आपको मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। अब लगता है स. का. पाटील भी उन्हीं में शामिल हैं। इस पर मैं एक निष्कर्ष तक पहुंचा हूं कि मैंने कोई अच्छा काम किया होगा इसीलिए श्रेय लेने की यह होड़ मची हुई है।

अब लोग कहने लगे हैं कि मैं कृतघ्न हो गया हूं। लेकिन मैं ओ-कॉनल इस आइरिश देशभक्त के शब्दों में उन्हें जवाब देना चाहता हूं। वह इस प्रकार है, "No man can be grateful at the cost of his honour, no woman can be grateful at the cost of her chastity, and no nation can be grateful at the cost of its liberty." मेरा सच्चापन अगर एक ओर रख कर मैं कृतज्ञ रहूंगा तो मानवी व्यक्तित्व का ही वध होगा ऐसा मैं मानूंगा। मुझे मेरी ईमानदारी अधिक महत्वपूर्ण लगती है।

आज किसी भी सरकार की श्रेष्ठता वह कितना जनहित में काम करती है इस पर निर्भर करता है। अन्न-वस्त्रादि बातें तो महत्वपूर्ण हैं ही लेकिन राजकाज कितनी ईमानदारी से किया जाता है यह उन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। देश में पिछले चार सालों से अनाज की कमी, कपड़ों की कमी आदि संकट तो आते ही रहे हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण दोष अगर कोई हो तो वह है बेईमानी और घूसखोरी से भरा प्रशासन। राज्य का प्रशासन सही रखने के लिए तो बाहर से किसी मदद की जरूरत नहीं पड़ती। बस उसे सही रखने की इच्छा होना जरूरी है। राज्य प्रशासन को सही रखने में आज काँग्रेस के सामने अगर कोई अड़चन है तो वह यह कि काँग्रेस को ही उसे सही करने की इच्छा नहीं रही।

उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल आदि प्रांतों में जनता ने ही नहीं काँग्रेस वालों ने ही काँग्रेसी मंत्रियों के खिलाफ कई आपत्तियां उठाई हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि उनमें से किसी भी प्रांत में उन भयानक आरोपों की न्यायालय द्वारा तो छोडि़ए पार्टी द्वारा भी पूछताछ नहीं की गई है। 1910-11 के आसपास लॉर्ड अॅक्विथ जब इंग्लैंड के प्रधानमंत्री थे लॉर्ड रीडिंग और लॉड जॉर्ज का एक केबल काँट्रॅक्ट में हाथ होने की संभावना प्रकट हुई थी। लेकिन उन्होंने तुरंत एक जांच आयोग गठन किया और वे निर्दोष साबित हुए। इसके बावजूद अॅक्विथ ने उन दोनों से इस्तीफा दिलवाया क्योंकि उन्हें लगता था कि