289 26-11-1951 सच्चाई को दरकिनार कर कृतज्ञ रहने को मैं मानवी व्यक्तित्व की हत्या मानूंगा - मुंबई - Page 274

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अपने सहयोगियों से बड़ा देशहित है। इसी प्रकार का दूसरा उदाहरण पिछले साल एटली के कार्यकाल के दौरान हुआ था। लॉर्ड लिस्टोवेल व्यापार मंत्री थे। एक व्यापारी मित्र से ब्रँडी की बोतल और सूट का कपड़ा लेने का उन पर आरोप था। बाद में पता चला कि आरोप तथ्याधारित न होकर वह एक मित्र द्वारा एक मित्र को भेंटस्वरूप दी गई थी। इसके बावजूद एटली ने उन्हें मंत्रिमंडल से निकाल दिया।

इंग्लैंड में राजकाज को साफ-सुथरा रखने की यह लगन देखिए और काँग्रेस की लगन देखिए। मंत्रियों के खिलाफ कितने गंभीर आरोप थे लेकिन उनका हुआ क्या?!

मैं कुछ और उदाहरण देता हूं। प्रतिनिधित्व का बिल बनाते हुए सरकारी अनुबंध जिनके पास हों उनके लिए पार्लियामेंट के दरवाजे बंद रहें इसका प्रावधान रखा गया था। लेकिन उसके कारण काँग्रेस के पार्लिमेंटरी दल में हल्ला मचा। आखिर मुझे वह हिस्सा हटाना पड़ा। दूसरा उदाहरण है। उसी बिल में मैंने हर उम्मीदवार के खर्चे पर नियंत्रण लगाया था। इस मुद्दे पर भी तूफान उठा। तीन दिनों तक चर्चा चल रही थी। पार्लियामेंट के काँग्रेस सदस्य नेहरू के पास मदद पाने के लिए दौड़े। उन्होंने नेहरू से कहा, ‘‘आप जिस व्यक्ति को काँग्रेस का दुश्मन मानते हैं उस इंसान के लिए आपने यह महत्वपूर्ण बिल तैयार करने के लिए क्यों कहा? वह काँग्रेस का नाश करने पर तुले हुए हैं।‘‘ मैंने उस बिल में यह प्रावधान कर रखा था कि किसी भी उम्मीदवार पर होने वाला चुनाव खर्च उसके नाम के साथ लिखा जाए। इसका असर यह होता कि चुनाव निधि का पैसा किसी भी उम्मीदवार के नाम पर दल के नाम से लुटाया नहीं जा सकता था। लेकिन आखिर मुझे यह धारा भी हटानी पड़ी। इसके दल में मैंने खूब कड़ी टक्कर दी लेकिन आखिर हार गया।

मुझे बताइए कि क्या यह मानसिकता प्रजातंत्र के साथ सही बैठती है? हर देश के चुनाव कानून में इस प्रकार की धारा है। प्रजातंत्र के प्रति निष्ठावान कोई भी पार्टी इसे सहन नहीं कर सकती। क्योंकि कोई भी कानून चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो प्रत्यक्ष व्यवहार में उस पर किस प्रकार अमल होता है उसका राजकाज में महत्व है।

ये राज्य प्रशासन के दोष हुए। दिल्ली से इधर आते हुए मुझे पता चला कि इस हिस्से में कुछ जगहों पर स्थानीय काँग्रेस नेता न्यायाधीशों पर दबाव डाल कर निर्णय को अपने अनुकूल बनाने का प्रयस करते हैं। हमारे संविधान में कहा गया है कि कानून की निगाह में सब एक समान हैं। इस प्रकार के हस्तक्षेप के कारण इस देश का क्या होगा कहा नहीं जा सकता।

मुझे लगता है काँग्रेस को इस देश में विरोधी पार्टी को मसल देने की बातें करने की जगह उनके बढ़ने के लिए प्रोत्साहन देने की व्यवस्था करनी चाहिए। जिन देशों में पार्लिमेंटरी प्रजातंत्र है क्या वहां कई पार्टियां नहीं हैं? तो फिर आपको यहां क्यों डर