10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रकार पट्टे से बांधता है और इस बात का ख्याल रखता है कि उसका कुत्ता कहीं और न जाए उसी प्रकार का पट्टा है काँग्रेस का टिकट। काँग्रेस को पास भी फटकने ना दो। काँग्रेस का उम्मीदवार अपना दुश्मन है। वह दूसरों के अधीन है। हमारे लोग पराश्रित न हों इस बारे में आपको जागरुक रहना होगा।
परवशता कैसे नुकसानदेह होती है इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण मैं आपको बताता हूं। फलटण के कुछ महारों को 4 बीघा जमीन मिली थी। कुछ कारणों से वहां का राजा एक मंदिर में हर रोज 500 ब्राह्मणों को पंचपकवानों का भोजन कराता था। हर रोज राजमहल से वहां गाडियां भर-भर कर खाना आता। वहां के महार लोग उनका जूठन खाकर गुजारा कर लेते और इसीलिए खेती नहीं करते थे। महारों की जमीन पर जंगल उगा कर मराठों ने कब्जा कर लिया। आगे 60-70 वर्षें के बाद राजा को समझ में आया और उसने ब्राह्मणों को भोजन कराना बंद किया। महारों को भी जूठन मिलनी बंद हुई। बाद में एक बूढ़ा अपनी जमीन वापिस पाने के लिए जमीन के कागजात लेकर मुझसे मदद मांगने आया, लेकिन 1874 से पहले जमीनें गई थीं इसलिए कुछ किया नहीं जा सकता था। इस प्रकार जूठन के कारण महारों को अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ा और पराश्रित जीवन के कारण उनके हक गए, इसलिए आप सब नींद से जागिए और आंखें खुली रखिए। साल दो साल में ही यहां बड़ा परिवर्तन होने वाला है। अंग्रेज सत्ता छोड़ देंगे तब सारी सत्ता किसी और के पास जाए, इससे पहले हमें अपना हिस्सा भी चाहिए। इसी कारण आने वाले चुनाव एक निर्णायक संग्राम की तरह हैं। कौरव-पांडवों के संग्राम की तरह।
हमारे ब्राह्मणेतर साथी अब काँग्रेस की ओर झुक रहे हैं। अब काँग्रेस और हमारी फेडरेशन के बीच झगड़ा है। हमने तय किया, अगर हम एकजुट हुए तो निश्चित रूप से जीत हमारी ही होगी। हमेशा के लिए स्थितियों में फेरबदलाव लाना हो तो तय करना होगा कि आत्म-सम्मान के साथ ही जिएंगे भले आत्मसम्मान पाने की लड़ाई में जान भी क्यों न गंवानी पडे।
20 साल पहले की स्थितियों और आज की स्थितियों में जमीन-आसमान का फर्क है। उस समय 90 प्रतिशत लोग यही कहते कि ‘हुजूर, हम आपकी गौशाला में ही रह लेंगे।’ आज हममें से एक भी व्यक्ति यह कहने के लिए राजी नहीं होगा। यह खुशी की बात है। पहले महारों को विधिमंडल की इमारत में झाडू लगाने का काम दिया जाता था, लेकिन आज मेरे 15 लोग विधिमंडल में सदस्य बने हैं। अन्य लोगों के साथ वहां वे सम्मान के साथ बैठते हैं। आगे चल कर वे मंत्री भी बन सकते है, इसीलिए ये चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हैं। ब्राह्मण या ब्राह्मणेतर चुनाव लड़ते हैं अपना सम्मान बढ़ाने के लिए, लेकिन आप और हमें विधिमंडल में अगर जाना है तो जिस चक्की में हम पिस रहे हैं