294 31-5-1952 सत्ताधारी पक्ष के साथ मतभेद होने के बावजूद देश का कभी अपमान नहीं होने देंगे - मुंबई - Page 282

 263

294

....सत्ताधारी पक्ष के साथ मतभेद होने के बावजूद देश का कभी

अपमान नहीं होने देंगे

‘‘भारत के संविधान निर्माण में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के महत्वपूर्ण योगदान के लिए 1950 में अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय ने उन्हें उपाधि देकर सम्मानित करने का आयोजन किया। भारत के किसी सही और लायक व्यक्तित्व का यह पहली बार विदेशी विश्वविद्यालय संस्थान द्वारा किया गया सम्मान होगा। विश्वविद्यालय ने उन्हें इस बात की सूचना दी। जिस विश्वविद्यालय से 1915 और 1917 साल में एम. ए. और पी.एच. डी. की उपाधियां उन्होंने हासिल की थी उसी विश्वविद्यालय द्वारा उनके कर्तत्व से प्रभावित होकर उनके सम्मान में उन्हें एक और उच्च उपाधि - डॉक्टर ऑफ लॉज - देकर अपना सम्मान कर रही है यह देखकर बाबासाहेब को बहुत खुशी हुई। जीवन में जो भी महत्वाकांक्षाएं थीं उन्हें जी-जान से मेहनत कर पूरा किया इस बारे में उन्हें संतोष हुआ। लेकिन इसी दौरान भारत के मंत्रिमंडल के सामने बड़े-बड़े सवाल उपस्थित हुए थे। उन्हें संवैधानिक तरीके से हल किया जाना था। इन महत्वपूर्ण कामों को दरकिनार कर कोलंबिया विश्वविद्यालय से उपाधि स्वीकारने के लिए जाना उन्हें ठीक नहीं लगा। साथ ही, छह हजार मीलों की लंबी यात्रा बीमारियों के कारण थकी हुई देह झेल पाएगी इस बारे में भी उन्हें विश्वास नहीं था। इसीलिए उन्होंने यूनिवर्सिटी को सूचना भेजी कि फिलहाल अमेरिका आने की फुर्सत नहीं है। यूनिवर्सिटी के तत्कालीन अध्यक्ष जनरल एसेनहावर थे। आगे वे अमेराका के अध्यक्ष बने। बाबासाहेब अगर उस वक्त जाते तो एसेनहावर के हाथों यह कार्यक्रम होता। कोलंबिया विश्वविद्यालय बाबासाहेब की अनुपस्थिति में उन्हें उपाधि देने के लिए तैयार था। लेकिन बाबासाहेब ऐसा नहीं चाहते थे। अपनी विद्वत्ता जिस विश्वविद्यालय से प्राप्त हुई वहां स्वयं जाकर उपाधि स्वीकारने की अपनी इच्छा के बारे में उन्होंने विश्वविद्यालय को बताया। फिर 1952 के अप्रैल माह में सभी प्रमुख कार्यों की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर उन्होंने विश्वविद्यालय से पत्राचार किया। विश्वविद्यालय ने 5-6-1952 को उपाधि देने का समारोह आयोजित करने की घोषणा की। जिन विद्वानों का सम्मान करते हुए उपाधियां देनी थी उनके नामों की फेहरिस्त यूनिवर्सिटी ने मई माह के चौथे हफते में जारी कर दी। उसमें बाबासाहेब का नाम था। उसमें उनका नाम पढ़ने के बाद उनके हजारों चाहने वालों ने बधाई देते हुए उन्हें फोन किए, तार और खत भेजे। बाबासाहेब को बेहद चाहने वालों में भारत के विख्यात दार्शनिक और भारत सरकार के उप राष्टपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी थे।