294 31-5-1952 सत्ताधारी पक्ष के साथ मतभेद होने के बावजूद देश का कभी अपमान नहीं होने देंगे - मुंबई - Page 284

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‘‘रविवार, 1 जून, 1952 की रात में बाबासाहेब टी. डब्ल्यू. ए. के हवाई जहाज से न्यूयॉर्क के लिए निकलेंगे यह तय हुआ। तब उनके प्रशंसक, अनुयायी, मित्र, और पीपल्स एज्युकेशन सोसाइटी के कर्मचारियों आदि ने उन्हें 31 मई, 1952 की रात को क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया में उनके सम्मान में भोज का आयोजन किया। डॉ. वी. एस. पाटणकर (प्रिंसीपॉल) और आयु. के. वी. चित्रे, सचिव, पीपल्स एज्युकेशन सोसाइटी आयु. प्रभाकर पाध्ये, आयु. बी. एच. राव, आयु. डब्ल्यू आल्फ्रेड . चेयरमैन ऑफ दी यूनियन ऑफ जर्नलिस्टस् आदि लोग उपस्थित थे। डॉ. पाटणकर ने कहा, विदेशी विश्वविद्यालय उच्च उपाधियां देकर उनका सम्मान करती हैं और हमारे भारतीय विश्वविद्यालय, जहां से बाबासाहेब को पहली उपाधि मिली वह मुंबई विश्वविद्यालय भी उन्हें उच्च उपाधि देकर उनका सम्मान करने में क्यों हिचकिचा रहे हैं?

इससे यह स्पष्ट दिखता है कि भारत देश में ब्राह्मणवादियों द्वारा बनाई गई कुव्यवस्था और जातिवाद कैसे बर्बरता से भरा हुआ है। हमारे देश में अंधविश्वास, धर्मग्रंथों की पोंगापंथी कूट-कूटकर समाज व्यवस्था में भरी हुई है।

बाबासाहेब न्यूयॉर्क जाएंगे तो वहां भाषण देंगे और भारतीय अस्पृश्यों की समस्याओं को लेकर भारत सरकार की नीतियां कितनी उदासीन हैं इसके बारे में तथा अन्य प्रचलित ज्वलंत समस्याओं के बारे में अपने विचार प्रदर्शित कर भारत सरकार की अमेरिकी लोगों के सामने शायद खिल्ली उड़ाएंगे ऐसा डर कई लोगों ने व्यक्त किया था। इस आशंका को दूर करने के लिए उन्हें इस आशय के कुछ सवाल भी पूछे गए। इसलिए खाने के बाद बाबासाहेब ने धन्यवाद देने के लिए जो भाषण दिया उसमें उन्होंने इस आशंका को दूर किया।

उन्होंने अपने भाषण में कहा-

मेरे स्वभाव की प्रकृति गरम है। कई बड़े लोगों के दिखावा परस्त कार्यों की आलोयना कर मतैक्य स्पष्ट कर चुका हूं। लेकिन मैंने कभी देशद्रोह नहीं किया। इसका कारण मैं अपने देश से और अपने देशवासियों को अपनी जान से भी ज्यादा प्रेम करता हूं। मेरे देश के जो हालात हैं उनके बारे में मैं विदेशों में कभी भी नहीं बोलूंगा। अपने देश का मान कहां रखना है, और कैसे रखना है मैं अच्छी तरह जानता हूं। आज तक मैंने किसी भी अनजान विदेशी आदमी के सामने अपने देश के बारे में कुछ बुरा नहीं कहा। इसलिए बाहर जाकर बोलने की संभावना बिल्कुल नहीं है। जब कुछ लोगों को पता चला कि मैं विदेश जा रहा हूं तो उन्हें थोड़ा डर लगा कि मैं वहां अपने देश की सरकार के कामकाज के बारे में चर्चा करूंगा, वहां हमारे कामकाज के तरीकों के बारे में बता दूंगा। उन लोगों से मैं कहना चाहता हूं कि सत्तापक्ष से अथवा अधिकारी व्यक्ति से भले मेरे मतभेद हों, मैं देश की बुराई कभी नहीं करूंगा। मंत्रियों के साथ अथवा सरकार के साथ