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उस चक्की के खूंटे को अपने अधिकार में करने के लिए। हमें वहां जाकर जोर-जबरदस्ती और अन्याय को मिटाने का काम ही करना है। हमारे पास पैसा नहीं, हम बलवान नहीं, इसीलिए हमें राजनीतिक सामर्थ्य की जरूरत है। हमारी सहमति से ही राजपाट चलना चाहिए, इसीलिए, जिसे वोट देने का अधिकार प्राप्त है, वह अपने इस अधिकार को अमूल्य चीज समझे और इस्तेमाल करे। वोट यानी कड़े संघर्ष से प्राप्त ‘संजीवनी मंत्र’ है। उसके सही इस्तेमाल से ही हमारी सुरक्षा हो सकती है। स्वाभिमानपूर्वक जीने का वह एक सहारा है। उसकी देखभाल करें, इसी नजरिए से इन चुनावों को देखें।
विधिमंडल में भी हम अल्पसंख्यक हैं। कुल 175 सदस्यों में से हमारे सदस्यों की संख्या केवल 15 है। इतनी संख्या के साथ काम करना कठिन है। इसीलिए 15 की जगह अब हमें 20-25 लोगों को चुनाव में जिताना होगा। इसीलिए हम जनरल जगहों पर भी चुनाव लड़ रहे हैं। दक्षिणी हिस्से में मे. इनामदार को उम्मीदवार के रूप में खड़ा किया है। हम सब उन्हें चारों वोट देंगे तभी हमारी जीत हो सकती है। हमारे 10000 वोट हैं, उन्हें कम से कम 10000 वोट मिलने चाहिएं। हर किसी के 4 वोट और 4 जगहें हैं। इसीलिए सब अपनी जिम्मेदारी समझें। हमारे विरोधियों के पास पैसा है। विरोधियों द्वारा कालाबाजारी से कमाया गया पैसा अब वे पाप धोने के लिए काँग्रेस को चुनावों की वातिर दे रहे हैं। हम अगर पैसों के सहारे राजनीति करने लगे तो हमें राजनीति छोड़नी पड़ेगी। हमारे अस्पृश्य लोग काँग्रेस के पीछे नहीं हैं। अन्य लोग पैसे के बहकावे में आकर काँग्रेस के पीछे पड़े रहते हैं। काँग्रेस को अगर लोग मानते तो बिना फूटी कौड़ी
खर्च किए काँग्रेस का इलेक्शन हो जाना चाहिए। 1937 में मेरे विरोधी ने 35000 रुपये
खर्च किए। मेरे केवल 900 रुपए ही खर्च हुए जितने कि जरूरी थे और मैं अव्वल चुन कर आया। इसमें मुझे गर्व महसूस होता है, इसीलिए, कहना पड़ेगा कि अगर राजनीति कोई समझ सकता है वह केवल अस्पश्य ही। अन्य लोग अपने लिए राजनीति करते हैं। उनके सामने समाज का या देश के हित का मामला नहीं होता।
मैं पिछले 20 सालों से राजनीति में काम कर रहा हूं, तथा इस विषय का सूक्ष्मता से अध्ययन भी करता रहा हूं। मेरी राजनीति कभी विफल नहीं रही। राजनीति को अच्छी तरह से समझा और बूझा है। इसीलिए मेरी राजनीति सच्ची, ईमानदार और स्वाभाविक है। अन्य लोग पानी के किनारे खड़े रह कर, कूद-फांद कर केवल आनंद लेते हैं। उनके पास तजुर्बा नहीं। हमारी बात अलग है, इसीलिए आप सब जागरुक रह कर, विरोधियों के किसी भी तरह के छलावे-बहकावे में न आते हुए, उनकी धमकियों से न डरते हुए, समाज के उद्धार का पवित्र कर्तव्य पूरा करें, अपने चारों मत अपने ही उम्मीदवार को दें। उसे बताएं कि, जो कहना था वह कह कर मैंने अपना दायित्व निभाया है। मुझे उम्मीद है कि आप सब लोग अपना कर्तव्य पूरा करेंगे।