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क्या शिक्षित युवा, समाज की उन्नति के लिए कुछ करेंगे?
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को दिनांक 20 जुलाई, 1952 के दिन महार समाज सेवा संघ द्वारा फूलमालाओं से स्वागत किया। इस अवसर पर संघ द्वारा इमारत फंड में 26 रुपयों का चंदा दिया और निवेदन किया-
कार्यकारी मंडल द्वारा परमपूज्य बाबासाहेब अम्बेडकर के आशिर्वाद से संगमनेर और कर्जत के सिद्धार्थ बो²डग में पढ़ रहे 75 छात्रों के दो छात्रावासों की जानकारी दी। इनमें से कर्जत छात्रावास को अभी ग्रांट नहीं मिली है। इस छात्रावास को ग्रांट के बिना चलाना मुश्किल है।
संगमनेर के सिद्धार्थ बोर्डिग को थोड़ी-बहुत सरकारी मदद मिलती है। इसलिए उस छात्रावास के लिए अलग इमारत बनाने के बारे में विचार किया जा रहा है। आप अगर इस इमारत को आशिर्वाद देंगे तो उसे बनाने में हमारा उत्साह दोगुना होगा और इस मुश्किल काम को संघ पूरा कर सकेगा कार्यकर्ताओं ने यह जानकारी दी, तब डॉ. बाबासाहेब ने कहा-
आप सामाजिक कार्य कर रहे हैं इसका मुझे संतोष है। आपके संगमनेर छात्रावास के इमारत फंड के कार्य लिए मैं शुभकामनाएं देता हूं। लेकिन लोगों से एक सवाल पूछने का मेरा मन करता है कि जिस समाज के बच्चों को आप खुद मुश्किलें झेल कर शिक्षा प्रदान करते हैं क्या कभी यह सोचा है कि शिक्षा प्राप्त करने के बाद ये बच्चे अपने समाज की उन्नति के लिए क्या करने वाले हैं? क्या आप उनसे कोई प्रतिज्ञापत्र लिखवा रहे हैं? (जवाब ना में मिलने पर) बहुजन समाज की सेवा करने के लिए हमारे बीच से कुछ बच्चे तैयार होने चाहिए इस सोच के साथ मैंने सिद्धार्थ कॉलेज शुरू किया था। लेकिन कटु अनुभव ही मिल रहे हैं। इन बच्चों का व्यवहार ऐसा होता है कि, शिक्षा पाने के बाद कोई बड़ी नौकरी मिली कि बस! हो गया अपना काम! मैं कौन हूं? मुझे किसने शिक्षा-दीक्षा कैसे दी? मुझे शिक्षा देने के लिए उन्होंने कितने कष्ट सहे इस बात का थोड़ा-सा भी अहसास इन बच्चों को नहीं होता। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे अपने समाज को भूल जाते हैं। ऐसे लोगों को क्या कहें यही मेरी समझ में नहीं आता। इसलिए आप जो इतनी मेहनत कर रहे हैं वह बेकार है ऐसा आजकल मुझे लगने लगा है। वरना हमें कुछ ऐसा करना होगा कि जिससे उन पर कोई बंधन रहेगा। किसके बच्चों को
जनता, 26 जुलाई, 1952