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संघर्ष के सहारे मैंने अछूतों में ज्वलंत स्वाभिमान जगाया है
परमपूज्य डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता में मुंबई राज्य और मध्य प्रदेश के प्रमुख कार्यकर्ताओं की परिषद सिद्धार्थ कॉलेज में रविवार दिनांक 17 अग्स्त, 1952 को हुई थी। इस सभा में बाबासाहेब द्वार पहले ही घोषित किए जा चुके ‘‘शेड्यूल्ड कास्ट्स इंप्रूवमेंट ट्रस्ट’’ की ओर से मुंबई में बनाए जाने वाले हॉल के बारे में विचार हुआ।
बहुजनों के परमपूज्य डॉ. बाबासाहेब ने जैसे ही हॉल में प्रवेश किया और सबके अंतःकरण आनंद से भर आए। तालियों की गड़गड़ाहट के साथ गौरवान्वित होकर उनका स्वागत किया। इतने दिनों के बाद अपने नेता के पवित्र दर्शन होने के कारण सभी कार्यकर्ताओं को बेहद आनंद हुआ था। मुंबई राज्य के प्रमुख कार्यकर्ता, जिला अध्यक्ष आदि कई लोग सभा में उपस्थित थे। प्रांताध्यक्ष दादासाहब गायकवाड़, ज. से. बापूसाहेब राजबोज, बैरिस्टर बापूसाहब कांबले, दादासाहब शिर्के, आयु. आर. जी. खंडाले (दौंड), आयु. दादासाहेब पोवार (मनमाड़), पी. जी. रोहम (नगर), सावंतसाहेब (सातारा), आयु. बी. सी. कांबले, मुंबई शहर अध्यक्ष वरात, ज. से. भातनकर, आयु. बाबर (सोलापूर), जिलाध्यक्ष पी. टी. मधाले (सातारा) आदि प्रमुख कार्यकर्ता उपस्थित थे।
डॉ. बाबासाहेब ने कहा-
बहनों और भाईयों,
अस्पृश्यों के उद्धार के लिए एक व्यक्ति को एक युग में जितना कर पाना संभव था उतना मैंने किया है। मेरी कुछ कोशिश कामयाब रहीं कुछ नहीं रही होंगी, लेकिन मैंने अपना कार्य धैर्यपूर्वक जारी रखा है। 25 सालों में, मैंने आपके लिए जो किया, उतना किसी एक व्यक्ति द्वारा कभी कहीं नहीं किया गया। यह मैं अभिमान के साथ नहीं वरन् आत्मविश्वास के साथ कह रहा हूं। यह वास्तविकता है। मेरे कार्य की दिशा तीन तरह की थी।
पहली- अस्पृश्य समाज में स्वाभिमान पैदा करना। मुझे यह काम बहुत महत्वपूर्ण लगा। मेरे राजनीति में आने से पूर्व अस्पृश्य समाज किस हालत में था, किस स्तर पर था, कैसे मानवीयता से मरहूम था इसका केवल एक उदाहरण मैं आपको देता हूं। बीस-पच्चीस साल पूर्व जलगाव में हर साल ब्राह्मणभोज देने का रिवाज था। भोजन के
जनताः 23 अगस्त, 1952