276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बाद वे जूठी पत्तलें कूड़ेदान में फेंकते थे। वहां हमारे अस्पृश्य लोग बैठते थे। कूड़ेदान से वे उन पत्तलों को इकठ्ठा कर ले जाते। कभी-कभी उनमें इन जूठी पत्तलों को लेकर बड़े झगड़े होते अस्पृश्य समाज इस हालत में था। वह न केवल इंसानियत से मरहूम था, बल्कि अपनी स्थिति पर उन्हें कोई शर्म महसूस नहीं होती थी। मनुष्य के अधःपतन का वह सबसे निम्नकोटि का रूप था।
पिछले 25 सालों के संघर्ष के बाद अगर मैं उन्हें पूरी तरह से सुखी अगर नहीं बना पाया हूं। लेकिन उनके मन में मैंने ओजस्वी स्वाभिमान जरूर पैदा किया है। अन्याय से लड़ने का सामर्थ्य उनमें मैंने पैदा किया है। यह कोई साधारण काम नहीं है मैंने अपने समाज में यह बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण विचारधारा प्रवाहित की है।
दूसरी बात - राजनीतिक हक प्राप्त होने की। उस समय हमें पूर्वी दिल्ली कॅबिनेट में झाडू लगाने तक का काम नहीं मिलता था। आज 25 सालों के बाद वहां अस्पृश्य समाज का मंत्री है।
तीसरी बात शिक्षा के क्षेत्र की। 25 साल पहले अस्पृश्य के लिए शिक्षा के सभी दरवाजे बंद थे। संघर्ष के बाद उन्हें मैंने खोल दिया है। अस्पृश्य बच्चों को उच्च शिक्षा का मौका मिले इसके लिए सरकार के साथ भिड़ कर उनके लिए स्कॉलरशिप्स और फ्रीशिप्स की सारी सुविधा उपलब्ध कराई है। इतना ही नहीं वरन् जिन्हें वे अपना कह सकें ऐसा प्रगतिशील सिद्धार्थ कॉलेज उनके लिए खुलवा दिया है। इस कॉलेज में 300 अस्पृश्य छात्र पढ़ रहे हैं। हर साल उनके लिए 2000 रु. के वजीफे दिए जाते हैं। उनके रहने के लिए कॉलेज से लगा बो²डग बनाया गया है। इसी प्रकार औरंगाबाद में इसी कॉलेज की शाखा खोली है।
मेरी राय में एक और बात करना बाकी रह गया है। मुंबई शहर में अपने समाज को मालिकाना हक वाला एक हॉल बनाना है। इसके पीछे उद्देश्य बहुत अलग हैं। मुंबई में अन्य हॉल हैं। वहां नाटक, तमाशे, नौटंकियां आदि खेले जाते रहते हैं। इसी तरह के मनोरंजनात्मक कामों के लिए हॉल बनाने की मेरी इच्छा नहीं है। मेरे समाज को यही दिशा मिले और वे भी उच्च वर्गीयों की तरह सभी क्षेत्र में विकास करें यह मेरा उद्देश्य है।
हॉल बनाने के पीछे मेरा एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। गांव के अस्पृश्यों पर हर घड़ी स्पृश्यों से अत्याचार हो रहे हैं। आज ही मुझे एक खत मिला है कि औरंगाबाद के एक गांव में अस्पृश्य समाज की बस्ती को स्पृश्यों ने तार की दीवार से घेर लिया है और उनका जीवन असह्य बना दिया है। इस प्रकार की हजारों शिकायतें आए दिन मुझ तक पहुंचती हैं। उनके दुख आपसे अधिक मैं समझ सकता हूं। इन दुखों के निवारण के लिए एक केंद्रीय निधि की जरूरत है। रुपयों की जरूरत है।