298 28-9-1952 सार्वजनिक धन के गलत इस्तेमाल जैसा नीच कृत्य कोई और नहीं - मुंबई - Page 298

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मुंबई में कई तरह की इमारतें हैं। ब्राह्मण जातियों की इमारत हैं, मराठों की हैं, क्षत्रियों की हैं, इतना ही नहीं, कुणबियों (कुर्मियों) ने भी अपनी इमारत अथवा जाति का हॉल बनवा लिया है। उसी प्रकार अस्पृश्य समाज का भी एक हॉल या जातिगृह मुंबई में होना चाहिए ऐसी मेरी बहुत पुरानी इच्छा है। 1938 साल में इस काम के लिए मैंने मुंबई में इमारत फंड की स्थापना की। इस काम की जिम्मेदारी लेकर आज 10-15 साल बीत चुके हैं। इसके बावजूद इस कार्य को अब तक मूर्त रूप प्राप्त नहीं हुआ है। मैंने तय किया है कि कम से कम अब तो यह काम पूरा होना चाहिए। इस काम के पूरे होने से पहले अब मैं कोई और काम हाथ में नहीं लूंगा। यह काम बेहद आवश्यक है यह जान कर हर कोई पूरे मन से इसमें जुट जाएं। आज इस मद में मेरे पास जो रकम है वह इसप्रकार है - पहले की बची रकम 40 हजार रुपया, हीरक महोत्सव के लिए मुंबई के लोगों द्वारा इकठ्ठा किए गए और बचे हुए 18 हजार रुपए, इसमें बाहर गांव के 1 हजार रुपए हैं। मुंबई से बाहर वाले लोगों द्वारा इमारत फंड में भेजे गए 4 हजार रुपए और बिना ब्याज के मिले 32 हजार रुपए। बाकी रकम आप सभी को मिल कर जुटानी पडेगी। इस काम के लिए कर्ज लेने का मेरा ख्याल था। लेकिन अब मैंने वह ख्याल छोड़ दिया है। क्योंकि अगर कर्ज लेते हैं तो 10-12 प्रतिशत का ब्याज देना पड़ेगा। ब्याज के नाम पर इतनी बड़ी रकम देने का मेरा ख्याल नहीं है। आप सब लोग अगर चाहें तो बिना कर्ज के हम इस काम को पूरा कर पाएंगे। मुंबई में चॉल कमेटियां नियुक्त कर मुंबई के बाहर कुछ गांवों की या तहसीलों की कमेटियां बना कर आपको यह काम करना होगा। इस बारे में मैं दुबारा नहीं बताऊंगा। यही बताने के लिए मैं यहां आया हूं। पहली तारीख के बाद मैं दिल्ली जा रहा हूं। और शायद कई दिनों तक मैं लौट नहीं पाऊंगा। मैं यहां नहीं हूं तो यह काम रुकना नहीं चाहिए। मेरे होते हुए जिस तेजी से यह काम चल रहा है उससे अधिक तेजी से मेरे बाद भी यह काम चलता रहना चाहिए। आपके काम की रिपोर्ट मुझे दिल्ली में मिलती रहनी चाहिए और रिपोर्ट मुझे संतोष देने वाली होनी चाहिए। यहां जिन संस्थाओं के सहयोग से यह सम्मेलन किया जा रहा है वे सब इस काम को अपना काम समझ कर अपने-अपने विभागों में काम में लग जाना चाहिए।

आज दशहरा है। दशहरे को सोने का दिन कहते हैं। हालांकि सोना न आपके पास है न मेरे पास। आज का यह मौका बस सोने जैसा है। यहां से निकलने से पूर्व आप सब इमारत फंड इकठ्ठा करने के लिए सोने जैसी प्रतिज्ञा करें। आपकी प्रतिज्ञा की अगर कसौटी पर कसा जाए तो उसे 100 प्रतिशत ही निकलना होगा।

मेरी जनता गरीब है। लेकिन उन सब पर मेरा विश्वास है। मुझे यकीन है कि गरीब होने के बावजूद मेरी भावनाओं को आवाज दिए बगैर उनसे रहा नहीं जाएगा। हालांकि, पढ़े-लिखे लोगों से इस अवसर पर मैं दो शब्द कहना चाहूंगा। गरीब जनता द्वारा दिए