299 15-12-1952 विश्वविद्यालयों में भावी जीवन का निर्माण होता है। इस बारे में छात्रों में सजगता होना जरूरी है - मुंबई - Page 300

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विश्वविद्यालयों में भावी जीवन का निर्माण होता है इस बारे में

छात्रों में सजगता होना जरूरी है

15 दिसंबर, 1952 के दिन मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण आयोजित किया गया था। उन्होंने कहा-

इस कॉलेज में चार सालों तक मैंने पढ़ाई की लेकिन उस जमाने को मैं मीठी यादों वाला जमाना नहीं कह सकता। मैं इस कॉलेज का पहला ही अस्पृश्य छात्र था। सवर्ण छात्रों के साथ मिलने-बोलने का मेरा मन नहीं करता था। डर के कारण नहीं, मेरा मन सवर्ण छात्रों के साथ बातचीत करना ही नहीं चाहता था। मेरे कपड़े उनके कपड़ों की बराबरी के नहीं थे उनके व्यवहार में ऊच-नीचता का भेदभाव मुझे दिखता था। इसलिए, उनसे दूर रहना ही मुझे पसंद था। आजकल के छात्रों की तरह मेरा कॉलेज जीवन उत्साही नहीं था। मैं इसके लिए किसी को भी दोष नहीं देता। मेरे अध्यापकों ने और विद्यालय संचालकों ने मेरे साथ ठीक बर्ताव किया। उस जमाने के छात्रों में और आजकल के छात्रों में जमीन-आसमान का फर्क है।

आजकल के छात्र जिस विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं उसके कामकाज पर ध्यान नहीं देते। छात्र क्या पढ़ेंगे यह भले विश्वविद्यालय तय करता हो, लेकिन अपने बौद्धिक विकास के लिए जो हम पढ़ रहे हैं वह आवश्यक और पोषक है या नहीं इस ओर हर छात्र को ध्यान देना होगा। उनके भविष्य का गठन यहीं से होता है। वह राष्ट्र का आदर्श नागरिक बनेगा या उसका जीवन विफल होगा यह उसका पाठ्यक्रम ही तय करता है। इसलिए विश्वविद्यालय के हर घटनाक्रम की ओर छात्र का सूक्ष्मता से ध्यान देना जरूरी है। लेकिन आजकल के छात्र इस ओर से बिल्कुल ही लापरवाह होते हैं उनमें पढ़ाई के प्रति गंभीरता और रुचि कम दिखाई पड़ती है।

महाविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की जिंदगी के 4 साल बीत जाते हैं और वे उपाधियां लेकर कॉलेज से निकलते हैं। इसके बावजूद उन्हें नीत्शे, प्लेटो, बेकन, स्पिनोजा जैसे महान दार्शनिकों के दर्शन के बारे में कुछ भी पता नहीं होता। जिस दर्शन ने नए विश्व को खड़ा किया या कहें कि आज का हर नागरिक जिस दर्शन के सहारे अपना रोजमर्रा का दिन जो रहा है उन दार्शनिकों के दर्शन की ओर आज के उपाधिप्राप्त

जनताः 20 दिसंबर, 1952