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भरा हुआ था। हॉल के बाहर भी कई श्रोता खड़े थे। अध्यक्ष स्थान पर थे, सेशन्स जज श्री पी. सी. भट। अध्यक्ष के भाषण के बाद श्री सेठना और तुलपुले इन अवकाशप्राप्त वकीलों का डॉ. बाबासाहेब ने पुष्पमालाएं पहनाकर सम्मान किया। इसके बाद ज्युडिशल क्लर्क्स एसोसिएशन की ओर से डॉ. अम्बेडकर को पुष्पमालाएं पहनाई गई। बाबासाहेब अम्बेडकर का वह भाषण 5 से 7 बजे के दरमियान हुआ। ख्2,
बाबासाहेब ने कहा-
‘‘आज की शाम मैं आपके सामने जिस विषय पर बोलने वाला हूं उसे अपने शब्दों में बताना हो तो इस प्रकार कहा जा सकता है . ‘प्रजातंत्र में सफल कामकाज की कुछ पूर्व सुनिश्चित शर्तें’। किसी भी तरह की रोकथाम के बगैर प्रजातंत्र का शासन शुरू होने के लिए आवश्यक कुछ पूर्व सुनिश्चित शर्तें क्या हैं? इस विषय पर मैं अपने विचार रखना चाहता हूं।
मुख्य विषय पर आने से पहले मैं इस विषय की भूमिका आपको बताना चाहता हूं। पहला प्राथमिक मुद्दा यह है कि प्रजातंत्र के प्रकार हमेशा बदलते रहे हैं। हम प्रजातंत्र के बारे में बोलते हैं लेकिन प्रजातंत्र का स्वरूप हमेशा बदलता आया है। ग्रीक लोगों ने अथेनीयन प्रजातंत्र के बारे में बताया। लेकिन हर कोई यह जानता है कि मक्वन और पत्थर के बीच जितनी समानता है उतनी समानता अथेनीयन प्रजातंत्र और आधुनिक प्रजातंत्र में है। अथेनीयन प्रजातंत्र में 50 प्रतिशत लोग गुलाम थे और केवल 50 प्रतिशत लोग ही आजाद थे। गुलाम लोगों का शासन में कोई स्थान नहीं था। इसीलिए हमारा प्रजातंत्र अथेनीयन प्रजातंत्र से निश्चित रूप से अलग है। एक प्राथमिक विचार के तौर पर और एक बात की ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। एक ही देश में हमेशा के लिए प्रजातंत्र एक-सा नहीं होता। इंग्लैंड के इतिहास पर नजर डालिए। सन् 1688 के विद्रोह से पहले इंग्लैंड में जिस प्रकार का प्रजातंत्र था, उसी प्रकार का प्रजातंत्र विद्रोह के पश्चात् रहा ऐसा कोई नहीं कह सकता। इसी प्रकार 1688 और 1832 के दरमियान जब पहले सुधार कानून को मंजूरी मिली थी तब का प्रजातंत्र और 1832 में उस कानून को मंजूरी मिलने के बाद बदला प्रजातंत्र एक-सा था यह कोई नहीं कह सकता। प्रजातंत्र का स्वरूप हमेशा बदलता रहता है।
तीसरी बात की ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं और वह यह कि न सिर्फ प्रजातंत्र का स्वरूप बदलता है बल्कि प्रजातंत्र के उद्देश्यों में भी बदलाव आते रहते हैं। प्राचीन अंग्रेजी प्रजातंत्र का उदाहरण लेते हैं। उस प्रजातंत्र का क्या उद्देश्य था? राजा पर अंकुश रखना और साथ ही कानून की भाषा में जिसे परमाधिकार कहा जाता है उस
- जनता, 27 दिसंबर, 1952