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इस प्रकार किसी भी प्रकार के हालात में, आज मैं अपनी प्रजातंत्र की व्याख्या प्रस्तुत कर रहा हूं और ऐसा प्रजातंत्र कैसे सफल होगा यह मेरे भाषण का विषय है। दुर्भाग्य से जिन्होंने प्रजातंत्र के विषय में लिखा है उन्होंने कोई भी राय आग्रह के साथ नहीं रखी है। उनकी दलीलों से प्रजातंत्र को सफल बनाने की उनकी राय के अनुसार पूर्व सुनिश्चित शर्तों की हमें झलक मिलती है। इसके लिए आपको इतिहास पढ़ना पड़ेगा और इतिहास पढ़ने के परिणामस्वरूप दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जहां प्रजातंत्र का शासन है वहां प्रजातांत्रिक जीवन में आई बुराइयों की खोजबीन करनी होगी।
मेरी राय में प्रजातंत्र को सफलता से लागू होने की पहली शर्त यह है कि समाज में भयानक विषमता नहीं होनी चाहिए। शोषित वर्ग नहीं होना चाहिए। दमित वर्ग नहीं होना चाहिए जैसे भारत देश के समाज व्यवस्था में यह बबर्रता का रूप धारण कर चुकी है। एक के पास विशेषाधिकार और दूसरा वर्ग केवल कोल्हू का बैल इस प्रकार के वर्ग समाज में नहीं होने चाहिएं। समाज की इस व्यवस्था में, पद्धति में और विभाजन में खून से सनी क्रांति के बीज होते हैं और शायद इस रोग को नष्ट करना प्रजातंत्र के लिए असंभव होता है। गेट्टीसबर्ग के, जिसका मैंने पहले जिक्र किया था, अपने भाषण में अब्राहम लिंकन ने कहा था कि, ‘ढहा घर फिर खड़ा नहीं हो सकता।’ इसका अर्थ लोग स्पष्ट तरीके से समझ नहीं पाए हैं। स्पष्ट है कि उसने यह दक्षिण और उत्तर के राज्यों के संघर्ष के संदर्भ में कहा है। उसने कहा है, ‘दक्षिणी राज्यों में से आप और उत्तर के राज्यों में से हम इस प्रकार के विभाजनों में अगर हम विभाजित होकर रहेंगे तो विदेशी आक्रमणों का हम संगठित होकर सामना नहीं कर पाएंगे।’ उसने जब ‘ढहा घर फिर खड़ा नहीं हो सकता,’ कहा था तब उसके मायने उसकी नजर में पहले बताया अर्थ ही था लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि उसकी संज्ञा अथवा उसके वाक्य से इससे गहरा अर्थ प्रकट होता है। मेरी समझ में उसका मतलब आता है कि प्रजातंत्र के सफल होने की राह का सबसे बड़ा रोड़ा समाज के विभिन्न वर्गों के बीच पैदा हुई गहरी खाई ही है। क्योंकि, प्रजातंत्र में होता क्या है? प्रजातंत्र में कुचले लोगों को, शोषितों को और मानवी अधिकारों से वंचितों को और जो बोझ ढोने वाले बैल की जिंदगी जी रहे हैं उनके लिए विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के समान मतदान का अधिकार प्राप्त होता है विशेषाधिकार प्राप्त लोग, उन लोगों से कम होते हैं जिनके पास विशेषाधिकार नहीं होते। प्रजातंत्र में बहुसंख्यकों का कानून ही निर्णायक माना जाने के कारण अल्पसंख्यक विशेषाधिकारी लोग अगर अपने खास अधिकारों का स्वेच्छा से और राजीखुशी त्याग नहीं करते तो विशेषाधिकारी लोग और आम जनता के बीच पैदा होने वाली खाई के कारण प्रजातंत्र का खत्मा होगा और उसी में से कुछ और अलग पैदा होगा जो निहायत अलग किस्म का होगा।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में प्रचलित प्रजातंत्र व्यवस्था का अगर आप अध्ययन