300 22-12-1952 प्रजातंत्र में सफल कामकाज के कुछ पूर्व सुनिश्चित शर्तें - पुणे - Page 307

288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

करेंगे तो आपको पता चलेगा कि सामाजिक विषमता ही प्रजातंत्र के विनाश के कारणों में से एक प्रमुख है। मुझे इस बारे में कोई संदेह नहीं।

प्रजातंत्र के सफल कामकाज के लिए आवश्यक दूसरी बात है विपक्ष का अस्तित्व। सत्ता को कोसने वाले लोग न सिर्फ मैंने इस देश में देखे हैं, बल्कि इंग्लैंड जैसे देशों में भी मैंने ऐसे कई लोग देखे हैं। यहां आने से पहले मैं एक छोटी-सी किताब पढ़ रहा था जिसे हॅन्सार्ड सोसायटी ने प्रकाशित किया है और उस पुस्तक का विषय है - इंग्लैंड की प्रणाली। इस किताब में एक पूरा अध्याय इस विषय के लिए समर्पित है कि क्या प्रणाली अच्छी है? और, क्या प्रणाली को सहन किया जा सकता है? इस विषय पर काफी मतभिन्नता है। मुझे फिलहाल ऐसा लगता है कि पक्ष पद्धति के विरोध में होने वाले सभी और इस संदर्भ में जो विरोधी पक्ष के विरोध में हैं ऐसे सभी लोग प्रजातंत्र की संकल्पना को लेकर गलतफहमी के शिकार हैं। इसलिए प्रजातंत्र यानी क्या? मैं उसकी व्याख्या नहीं करता। मैं प्रजातंत्र के कार्य के बारे में सवाल पूछ रहा हूं। मुझे लगता है कि प्रजातंत्र के मायने हैं, ना कहने की शक्ति। विरासत के अधिकार या स्वयंसत्ता से प्राप्त अधिकारों का प्रतिरोध यानी प्रजातंत्र। देश पर जिनकी सत्ता है उनके अधिकारों के बारे में कभी अस्वीकार करने का प्रयोग करना यानी प्रजातंत्र है। स्वयंसत्ता शासनव्यवस्था में अस्वीकार या नकारने का अधिकार नहीं होता। एक बार राजा की नियुक्ति होने के बाद आनुवंशिकता के या दैवी अधिकार के आधार पर वह शासन करता है। हर पांच साल के बाद जनता के सामने जाकर उसे यह सवाल पूछने की जरूरत नहीं पड़ती - ‘‘क्या आपको लगता है कि मैंने पिछले पांच सालों में अच्छा काम किया है? और अगर ऐसा लगता है तो क्या आप मुझे फिर से नियुक्त करेंगे?’’ राजा की सत्ता को चुनौती देने का अधिकार किसी को नहीं होता। लेकिन प्रजातंत्र में जो सत्ता में होते हैं उन्हें हर पांच साल के बाद जनता के सामने जाकर जनता से पूछना पड़ता है कि क्या जनता की राय में वे, उनके हित की सोचने के लिए, उनकी रक्षा करने के लिए, उनके नियत जीवन में बदलाव लाने के लिए सत्ता और अधिकार पाने के लिए योग्य या लायक हैं? इसी को मैं नकारने का अधिकार कहता हूं। सत्ताधारी पांच सालों के अंत में जनता के सामने जाएं और दरमियान के समय में उनसे सवाल पूछने वाला कोई न हो ऐसे पंचवर्षीय नकारने के अधिकार से प्रजातंत्र संतुष्ट नहीं होता। लोगों की सत्ता की पंचवर्षीय दीर्घकालीन नकारने के अधिकार के प्रति ही सरकार जवाबदेह नहीं होती तो तत्काल नकारने की शक्ति की संसद में बहुत जरूरत होती है। इसीलिए शासन को वहीं और तत्काल चुनौती दे सकने वाले लोगों की प्रजातंत्र में बहुत आवश्यकता होती है। मैं जो कह रहा हूं वह अगर आपकी समझ में आ रहा हो तो आप यह सही तरीके से जान जाएंगे कि प्रजातंत्र यानी किसी को अखंडता से राज्य पर शासन करने का मिला हुआ अधिकार नहीं है। राज्य करने का अधिकार लोगों की मान्यता से बंधा होता है। संसद में उसे चुनौती दी जा सकती है। इससे आप समझ जाएंगे कि विपक्ष