290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बहाल करना। यह निश्चित रूप से एक अदना सा मामला है। परिणामस्वरूप इस प्रकार के भेदभाव के शिकार लोगों की संख्या भी बहुत कम होती है। लेकिन थोड़ा आगे जाकर देखें तो अगर इस प्रकार का भेदभाव शासन में बढ़ा तो क्या होगा? खयाल कीजिए कि किसी दल के सदस्य पर किसी अपराध के कारण बहुत सारे सबूतों के साथ अपराध दर्ज किया गया है और उस क्षेत्र का पक्षप्रमुख जिले के न्यायाधीश से जाकर कहे कि अपराधी उसके दल का होने के कारण उस पर मामला दर्ज करना ठीक नहीं होगा और आगे कहता है कि मेरे कहे के मुताबिक अगर आप नहीं मानें तो मामले को मंत्री महोदय के पास ले जाकर आपका यहां से तबादला कर दिया जाएगा। ऐसा अगर होने लगे तो शासन में किस तरह का अन्याय और कैसी अफरातफरी मचेगी इसके बारे में केवल सोचना भर काफी होगा। अमेरिका में ऐसे वाकये हो रहे थे। उन्हें (spoils system) कहा जाता था। नाश पद्धति यानी कोई दल सत्ता में आने के बाद उसके पूर्व की सरकार द्वारा नियुक्त किए गए कर्मचारियों को, क्लर्क और चपरासियों को भी काम से हटा देना। उनकी जगह नए पक्ष को सत्ता में आने के लिए जिन्होंने मदद की उन लोगों की नियुक्ति करना। इसी कारण अमेरिका जैसे देश को कई सालों तक अच्छा प्रशासन नहीं मिला। आखिर उन्हें अहसास हुआ कि ऐसी बातें प्रजातंत्र के लिए फायदेमंद नहीं हैं। इसलिए उन्होंने नाश पद्धति को खत्म कर दिया। इंग्लैंड में प्रशासनिक क्षेत्र को शुद्ध, निष्पक्ष, और राजनीतिक नीतियों से अलग रखने के लिए राजनीतिक कार्यालयों और प्रशासनिक कार्यालयों में अलग-अलग पहचान बनाई। प्रशासकीय सेवाएं स्थायी होती हैं। सत्ता में कोई भी हो, सभी पक्षों की वह एक-सी सेवा करती है।
इस प्रकार मंत्रीमहोदय द्वारा किसी भी प्रकार की दखल के बिना वह प्रशासन चलाती रहती है। इसी प्रकार का प्रशासन जब अंग्रेज हमारे देश में थे तब निश्चित रूप यहां अस्तित्व में था। मैं जब भारत सरकार का सदस्य था तब की एक घटना मुझे अच्छी तरह स्मरण में है। आप शायद जानते हों कि उस समय दिल्ली की कुछ सड़कों को और मंडलों को वॉइसराय के नाम दिए गए थे। लिनलिथगो ही एक ऐसे गवर्नर जनरल थे कि जिनका नाम दिल्ली की किसी सड़क को या संस्था को नहीं दिया गया था। उनके स्वीय सचिव मेरे मित्र थे। तब मेरे पास सार्वजनिक निर्माण विभाग था। कई काम मेरे तहत आते थे। वह एक बार मेरे पास आकर बोला, ‘‘डॉक्टर महोदय, लॉर्ड लिनलिथगो का नाम किसी संस्था या सार्वजनिक निर्माण को देने के बारे में क्या आप कुछ कर सकते हैं?’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘हरेक का नाम किसी संस्था अथवा सार्वजनिक निर्माण को दिया गया है। लेकिन केवल उन्हीं का नाम नहीं दिया जाना बहुत ही खटकने वाली बात है।’’ मैंने कहा, ‘‘मैं सोचूंगा।’’ उस वक्त मैं जमुना नदी पर गर्मी के मौसम में दिल्ली शहर को पानी की आपूर्ति करने के लिए बांध बनाने की योजना पर सोच रहा था। क्योंकि, गर्मियों में दिल्ली में पानी की किल्लत होती है। यह बात मैंने अपने प्रिअर नामक यूरोपियन सचिव से कही।