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मैंने कहा, ‘‘महोदय, देविए, गवर्नर जनरल के सचिव द्वारा कही गई बात के बारे में आप जानते ही हैं। इसलिए इस मामले में हम कुछ कर सकते हैं ऐसा क्या आपको लगता है?’’ क्या आप जानते हैं उन्होंने क्या कहा? उन्होंने कहा कि, ‘‘महोदय, आपको यह नहीं करना चाहिए। इस देश में इस प्रकार की बातें करना असंभव है।’’ कोई अधिकारी किसी मंत्री के खिलाफ बोले यह बात मेरी नजर में असंभव है लेकिन उस जमाने में ऐसी बातें संभव थीं। क्योंकि अंग्रेजों की ही तरह हमने भी यह उचित निर्णय लिया था कि शासन को प्रशासन में दखल नहीं देनी चाहिए। क्योंकि शासन का कार्य प्रशासन के कामकाज में दखल देना नहीं बल्कि नीतियां तय करना होता है। यह बेहद बुनियादी बात है और मुझे डर लगता है क्योंकि हम उस न्याय से अब अलग हो गए हैं। हमारे पास की इस बात को या तो हम पूरी तरह से त्याग देंगे या फिर उसे समाप्त कर देंगे।
मेरी राय के अनुसार सफल प्रजातंत्र की चौथी पूर्व सुनिश्चित शर्त यह है संवैधानिक नैतिकता। हमारे संविधान को लेकर कई लोग अतिउत्साही लगते हैं। मुझे सचमुच इस बात का डर लगता है। लेकिन मैं वैसा नहीं हूं। जो लोग भारतीय संविधान को समाप्त कर नया मसौदा बनाना चाहते हैं ऐसे लोगों में शामिल होने के लिए मैं सचमुच तैयार हूं। लेकिन हम यह बात भूल जाते हैं कि हमारा संविधान वैध प्रावधानों का ढांचा या कंकाल भर है। इस कंकाल का मांस होता है संवैधानिक नैतिकता। इंग्लैंड में इसे संविधान के संकेत कहा जाता है। और लोगों ने इस खेल के नियमों का पालन करना ही चाहिए। इस संदर्भ में मुझे इस वक्त याद आ रहे एक-दो उदाहरण मैं आपको बताता हूं। आपको यह याद होगा कि जब अमेरिका के 13 उपनिवेशों ने विद्रोह किया तब वॉशिंग्टन उनका नेता था। तत्कालीन अमेरिकी जीवन में केवल नेता कह कर वॉशिंग्टन का जिक्र करना यानी असल में उसकी योग्यता का अवमूल्यन करना था। क्योंकि अमेरिकी लोगों के लिए वॉशिंग्टन प्रत्यक्ष परमेश्वर ही था। आप अगर उसकी जीवनी पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि वहां का संविधान जब बन कर तैयार हुआ तब उसे अमेरिका का पहला राष्ट्रपति चुना गया। उसका कार्यकाल खत्म होने के बाद क्या हुआ? दूसरी बार चुनाव लड़ने से उसने मना किया। मुझे रत्ती भर भी शक नहीं कि अगर वह दस बार राष्ट्रपति पद के लिए खड़ा रहता तो भी हर बार बिना किसी विरोध के चुनाव जीत जाता। लेकिन दूसरी बार उसने मना किया। जब उससे पूछा गया कि ऐसा आपने क्यों किया, तो उसने बताया कि मेरे मित्रों, जिस उद्देश्य के साथ हमने अपना संविधान बनाया वह शायद आप भूल गए हैं। हमें आनुवंशिक राजसत्ता नहीं चाहिए। उसी प्रकार हमें आनुवंशिक राजा अथवा तानाशाह नहीं चाहिए। इसीलिए हमने यह संविधान तैयार किया है। इंग्लिश राजा की राजनिष्ठा का त्याग और उससे इनकार कर आप अगर इस देश में आए हैं और सालोंसाल और निरंतरता से आप मेरी पूजा करने लगे तो आपके सिद्धांतों का क्या होगा? इंग्लिश राजा की जगह अगर आपने मुझे बिठा दिया तो क्या आप कह सकते हैं कि आपने इंग्लिश राजा के खिलाफ