300 22-12-1952 प्रजातंत्र में सफल कामकाज के कुछ पूर्व सुनिश्चित शर्तें - पुणे - Page 313

294 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

निर्भर होता है, तब बहुमत वालों को अन्यायकारी तरीके से पेश नहीं आना चाहिए।

एक और मुद्दे का जिक्र कर मैं भाषण पूरा करने जा रहा हूं। मेरी राय में समाज की नैतिकता को जागृत और क्रियाशील रखना प्रजातंत्र के लिए आवश्यक होता है। दुःख की बात है कि हमारे राज्य विज्ञान के विद्वानों द्वारा प्रजातंत्र के इस पहलु के बारे में सोचा ही नहीं गया है। ‘नीतिशास्त्र राजनीति से अलग होता है। हम राजनीति सीख सकते हैं और नीतिशास्त्र के बारे में बिना कुछ सीखे भी काम चल सकता है। क्योंकि राजनीति नीतिशास्त्र के बगैर भी काम कर सकती है।’ मेरी राय में यह एक आश्चर्यचकित करने वाला वाक्य है। आखिर जनतंत्र में क्या होता है, कैसे काम चलता है? प्रजातंत्र के बारे में बोलते हुए ‘मुक्त शासन’ का जिक्र होता है। हम मुक्त शासन के क्या मायने समझते हैं? समाज जीवन के भव्य नजरिए से लोगों को कानून के हस्तक्षेप के बगैर प्रगति करने के लिए मुक्त करना और अगर कानून बनाना ही हो तो कानून बनाने वाले को इतना यकीन होना चाहिए कि कानून के फल होने के लिए समाज में जरूरी नैतिक वास्तविकता मौजूद है। प्रजातंत्र के इस पहलु का जिक्र करने वालों में मेरी जानकारी के मुताबिक लास्की ही इकलौता व्यक्ति है। अपनी एक किताब में उसने पूरे यकीन के साथ कहा है कि ‘प्रजातंत्र में नैतिक सुस्थिति हमेशा स्वीकारनी पड़ती है।’ नैतिकता अगर न हो तो अपने देश में फिलहाल जैसे हो रहे हैं उसी प्रकार प्रजातंत्र के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।

निर्देश करने लायक आखरी मुद्दा है कि प्रजातंत्र को प्रजा की निष्ठा की बहुत जरुरत होती है। अन्याय सभी देशों में होता है इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन हर जगह उसकी तीव्रता एक-सी नहीं होती। कुछ देशों में अन्याय की तीव्रता बहुत कम होती है तो अन्यत्र कहीं लोग अन्याय के बोझ तले पिचके होते हैं। इस बारे में इंग्लैंड के ज्यू लोगों का उदाहरण दिया जा सकता है। क्रिश्चियनों ने जो अन्याय किया उनमें ज्यू लोगों को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि इस अन्याय से मुक्ति पाने के लिए केवल ज्यू लोगों को ही संघर्ष करना पड़ा। इस अन्याय का कारण भी असामान्य था।

पुराने ईसाई कानून के मुताबिक लड़कों को पिता की संपत्ति में विरासत का अधिकार नहीं मिलता था। वजह यह थी कि बच्चे ईसाई नहीं ज्यू हुआ करते थे। राज्य के हिस्से का मालिक मृत्युपत्रों के अनुसार राजा हुआ करता था इसलिए मृत ज्यू व्यक्ति की संपत्ति वह स्वीकार कर लेता था। राजा को यह बात पसंद थी। राजा खुश था। मृत ज्यू के बच्चे जब संपत्ति का हिस्सा पाने की अर्जी लेकर राजा के पास जाते तब राजा उन्हें थोड़ी संपत्ति दिया करता था, और बाकी सब अपने पास रखा करता था। स्पष्ट है कि लेकिन, जैसा कि मैंने पहले ही आपको बताया, किसी भी अंग्रेज व्यक्ति ने ज्यू लोगों की मदद नहीं की। ऐसे हालात में ज्यू लोगों ने अपना संघर्ष जारी रखा। लोकनिष्ठा के अभाव का यह उदाहरण है। लोकनिष्ठा का मतलब है सभी अन्यायों के खिलाफ आंदोलन के लिए