298 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कर रखने के बाद अगर किसी महिला को पता चले कि दही जमने के बजाय फट गया है तो उसका जो हाल होगा वैसा ही मेरा हाल हुआ है। चार सालों तक कलम घिस कर मैंने उस बिल को जो स्वरूप तैयार किया था उसी स्वरूप में नया बिल आएगा या नहीं यह कहा नहीं जा सकता। जो तैयार किया है उसमें आमूलचूल परिवर्तन होगा ऐसा भी नहीं लगता। मेरे बिल की आलोचना करते हुए कहा गया कि वह हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार नहीं है। ऐसा कहने वालों को मैं चुनौती देना चाहूंगा कि वे इस बिल में से मनुस्मृति के आधार के बगैर लिखी कौन-सी धारा है यह वे मुझे बता दें।
साथ ही, महिलाओं के लिए उसमें तलाक की व्यवस्था भी की गई थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन त्रिवर्णी समाज को अगर छोड़ दें तो बाकी समाज में तलाक का चलन है ही। भारत के 90 प्रतिशत शूद्रों में तलाक प्रचलित है। लेकिन कानून में तलाक का प्रावधान रखने पर उपर्युक्त त्रिवर्णियों ने मुझ पर आलोचना की झड़ी लगा दी।
इस बिल में महिलाओं के हित के सभी मामलों का प्रावधान है। उनमें कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान इस प्रकार हैं। शादी या गोद लेने के मामलों में जाति का बंधन नहीं होना चाहिए यह प्रमुख प्रावधान था। इसका मतलब जबरदस्ती दूसरी जाति में विवाह अथवा गोद लेने का विधान हो यह नहीं था। एक दूसरे से प्रेम के कारण अगर किसी को दूसरी जाति के व्यक्ति से शादी करनी हो या दूसरी जाति के बच्चे को गोद लेने की इच्छा हो तो परम्पराओं के कारण उन पर जो पाबंदी थी उसे इस बिल के सहारे मैंने हटा दिया था।
पति को ही परमेश्वर मानने वाली आर्य महिलाएं हैं। पति चाहे कैसा भी बर्ताव क्यों न करे, कितना भी बुरा पेश क्यों न आए, वह कितना भी बुरा क्यों न हो, उसके साथ जीवन बिताना भले कितना भी कष्टकारी क्यों न हो आर्य महिला अपने पति को छोड़ कर जा नहीं सकती। पति को लेकिन छूट है, इसीलिए जिस पत्नी को अपने पति के साथ घर चलाना अच्छा नहीं लगता हो उसे इस बिल में तलाक लेने की सहूलियत दी गई है।
इसी प्रकार स्त्री-धन का भी प्रबंध किया गया था। पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पत्नी को मिलने पर आज तक पाबंदियां थीं, जिन्हें मैंने हटा दिया है। पति की कुल संपत्ति की मालिकियत उसके बाद उसकी पत्नी को ही मिलनी चाहिए तथा किसी महिला की मौत के बाद उसकी संपत्ति उसकी बेटी को ही मिलनी चाहिए यह मेरा हठवाद है। पिता के गुजर जाने के बाद भाइयों के बीच पिता की संपत्ति का बंटवारा होता है। उनके साथ उनकी बहन को भी उसमें हिस्सा क्यों नहीं मिलना चाहिए? सभी तरह से महिलाओं के हित में जाने वाले इस बिल को मंजूर करवाने के लिए महिलाओं ने कोई कोशिश नहीं की इसका मुझे खेद है। पुरुष होने के बावजूद मैं महिलाओं के