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ही दो लोमड़ी के दो बच्चे दिखाई दिए। वह उन्हें उठा कर ले आई और अपने शावकों के साथ रखा। अपने शावकों के साथ वह उन्हें भी दूध पिलाया करती थी। सभी शावक बड़े होकर एक बार एक जगह वड़े थे अचानक वहां एक हाथी सिर हिलाते हुए आया। उसे देखते ही लोमड़ी के बच्चे भाग खड़े हुए तब मादा सिंह के बच्चों को शक हुआ। उन्होंने अपनी मां से इस बारे में पूछा। उनके मन में दोबारा शक पैदा न हो इसके लिए वह उन्हें ले जाकर जंगल में छोड़ आई।
कहानी बताने का मतलब यही है कि हम पिछले चुनावों में हारे नहीं हैं। हमारे लोगों ने खुद पैदल आकर मतदान किया। जिन लोगों को लगता है कि हमारे लोगों ने हमें वोट नहीं दिए वे अगर इस बात को साबित कर दें तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा।
अब हम अकेले हैं। हम अल्पसंख्यक हैं। हम अपनी ताकत के अनुसार लड़ते आये हैं। दूसरों से हाथ मिला सकें तो हम राज्य पाएंगे। लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। आज काँग्रेस की सरकार एक ही थाली में दोनों मुंह घुसाये हुए हैं। इस प्रकार ब्राह्मण और मराठों के सहारे चल रही है। हमें देखना यही है कि चना कौन खाता है। मराठों का घोड़ा नया है। दूसरी बार मराठा सारा चना खा जाएंगे। आगे चल कर ब्राह्मणों के लिए कुछ नहीं बचेगा और वे दुबारा हमारी तरफ झुकेंगे। मराठों को ‘नली’ मिली अब हमारा ‘घुडसा’ बाकी है। यह कोई अपनत्व का भाव नहीं है। इसके कारण पेशवाई आएगी।
हमारी सरकार घटना से मिले अधिकार लेने वाली है। जवाहरलाल नेहरू ने नागपूर की ‘हरिजन’ परिषद में भाषण किया। उसमें अब अस्पृश्यों को रियायतों की कोई जरूरत नहीं, उनमें सुधार हो चुका है। मुझे लगता है इस नेहरू को ठाणे शहर के पागलों के अस्पताल में रखना होगा। जिसे अपने देश के लोगों के हालात के बारे में पता नहीं है उसे प्रधानमंत्री पद पर बैठाया जाए यह देश है। इस प्रकार हमें दी गई सुविधाएं वापिस ली जा रही हैं।
हमारे प्रधानमंत्री को दक्षिण अफ्रिका की समस्या आंखों के सामने दिखाई देती है। भारत में हर गांव में दक्षिण अफ्रिका है। दक्षिण अफ्रिका का सवाल वर्णभेद का है। उनके लिए वहां के अंग्रेज आगे बढ़ कर काम कर रहे हैं। लेकिन ये हमारे सवाल को टालने के लिए तैयार हो गए हैं। इसलिए ऐसे प्रधानमंत्री को पागल कहें या सयाना यह सवाल है। पेशवा के सरदार बापू गोखले ने मुसलमानों पर आक्रमण किया। उसमें सिदनाक महार भी था। उसका तंबू पेशवाओं के पास हुआ करता था। उसे तंबू गाडने में पेशवा लोगों ने अड़ंगा खड़ा किया। खबर जब पेशवा तक पहुंची तब दरबार लगा हुआ था। सिदनाक सरदार ने अपनी तलवार नीचे रखी और वह निकलने लगा। तब हंबीरराव मोहिते तपाक से खड़ा हो गया और उसने कहा, यह कोई शादी का भोज नहीं है, यह वीरों का भोज है। यहां कोई भेदभाव नहीं। इसलिए हमें राजनीति में श्रेष्ठ हिस्सा चाहिए।