307 27-5-1953 मैंने तय किया है कि अपने जीवन के आखिरी दिन बौद्ध धर्म प्रसार में बिताउंगा - परेल (मुंबई) - Page 328

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मैंने तय किया है कि अपने जीवन के आखिरी दिन बौद्ध धर्म के

प्रचार-प्रसार में बिताऊंगा

दिनांक 27 मई, 1953 को बुद्ध जयंति थी। उसी बहाने सुबह 8 बजे वरली के अम्बेडकर मैदान में डा.ॅ बाबासाहेब अम्बेडकर इस बात का मार्गदर्शन करेंगे कि सामुदायिक प्रार्थना कैसे करनी चाहिए। शाम 5 बजे परेल के नरे पार्क (जी. आई. पी. रेलवे वर्कशॉप के सामने का मैदान) में उनका सार्वजनिक व्याख्यान आयोजित किया गया है। इस कार्यक्रम की घोषणा बौद्ध धर्म प्रचार समिति के सचिव आयु. आर. डी. भंडारे ने दिनांक 23 मई, 1953 को की थी।

उसके अनुसार मुंबई के नरे पार्क में 27 मई, 1953 की शाम को इस कार्यक्रम के लिए प्रचंड जनसमुदाय हाजिर हुआ था। कार्यक्रम की शुरूआत में आर. डी. भंडारे ने भगवान बुद्ध के फोटो को फूलमाला पहनाई। उसके बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर अपने भाषण में बोले-

बहनों और भाइयों,

आज बुद्ध जयंति के बहाने हम सब एकत्रित हुए हैं। अन्य कई जगहों पर जिस प्रकार मनाई जाती है उसी तरह आज इस जगह भी बुद्ध जयंति मनाई जा रही है लेकिन इस कार्यक्रम का अलग महत्व है। 1942 साल से ही मैं सरकार से मांग कर रहा था कि इस दिन को छुट्टी घोषित की जाए। उस समय के गृहमंत्री आयु. मैक्सवैल की भी मंशा थी। लेकिन मेरी इच्छा पूरी नहीं हो सकी। युद्धकाल के कारण आयु. मैक्सवेल की इच्छा भी पूरी नहीं हो सकी। उन्हें चिंता थी कि बुद्ध के जन्मदिन की छुट्टी की अगर घोषणा की जाए तो युद्ध के लिए मुसलमानों से जो मदद मिल रही है वह नहीं मिलेगी। उसके बाद फिर से मुझे काँग्रेस के मंत्रिमंडल में लिया गया। मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद मेरी मांग कम से कम नेहरू पूरी करें इसलिए मैं उनके पीछे पड़ा। मेरी इस मांग के लिए महाबोधि सोसाइटी के अध्यक्ष शामाप्रसाद मुखर्जी ने भी सहायता की। तैंतीस करोड़ हिंदू भगवानों के जन्मदिनों की छुट्टियां, मुस्लिम, ईसाई, पारसी, जैन आदि धर्मों के भगवानों के जन्म दिनों की छुट्टियां अगर मिलती हैं तो फिर बुद्ध जयंति के दिन क्यों न छुट्टी हो? मैंने नेहरू जी से मांग की कि या तो इन सभी छुट्टियों में से

जनता, 30मई, 1953