14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सबको अगर तलाशा जाए तो, हजारों रुपयों की बात तो छोड़ ही दीजिए, 100 कौडियां तक उनके पास से नहीं निकलेंगी। काँग्रेस की कूटनीति के दांव-पेंच हम खूब पहचानते हैं, इसीलिए हमारा साफ सवाल है कि, क्यों आप इस प्रकार रुपया फेंकते हैं? हमारा संगठन तोड़ना ही चाहते हैं ना?
बै माने हमसे टूट कर अलग न हों इसलिए मैंने बहुत कोशिश की। उनके कल्याण के लिए मैंने काफी कोशिशें कीं। उनकी शिक्षा के लिए मैंने हर संभव मदद की। उनकी शिक्षा का सही उपयोग हो, इसलिए कोशिश की लेकिन आखिर माने ने हमें दगा दिया। मैं चाहता था कि वह जज बनें, मशहूर कानूनविद् बनें। लेकिन मेरी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई। पढ़ी हुई विद्या पर वह अमल नहीं कर सके। जैसे विलायत जाकर इलेक्ट्रिसिटी की पढ़ाई कर लौटने वाले छात्र द्वारा जूतों की दुकान खोली जाए बिल्कुल वैसा हाल माने का हुआ है। कोल्हापुर जैसे संस्थान में वह अपना जलवा दिखा नहीं सके। जहां अस्पृश्यों की उन्नति के लिए अधिकारी वर्ग भी अनुकूल है वहां वे अपना विकास नहीं कर पाए। ऐसे में अंग्रेजों के भारत में वह क्या कर सकेंगे? माने ने अपनी जाति से द्रोह किया है।
मैंने सुना है कि अपना प्रचार करते समय माने कहते हैं कि तमाखू का व्यापार करने वाले महारों को जो सुविधाएं उपलब्ध हैं वे मैंने ही उपलब्ध कराई हैं। यह बात साफ झूठ है। जो सुविधाएं उपलब्ध हैं वे मैंने हासिल की हैं, माने ने नहीं। दिल्ली में माने मेरे घर आए, मेरे घर ही वे ठहरे भी। वह प्रार्थना लेकर आए थे कि ‘‘कोल्हापुर की रीजन्सी काउंसिल में मुझे मिनिस्टर बनाएं’’। लेकिन यह बात बनी नहीं, यही वास्तविकता है।
आखिर में मुझे आपसे बस इतना ही कहना है कि वराले को ही अपने वोट देकर बहुमत से विजयी बनाएं।