312 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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छवि बिगाड़ने वाली पोषाकें ना पहनें
चेंबूर, मुंबई के अस्पृश्य संगठन मंडल की ओर से डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को हीरक महोत्सव के उपलक्ष्य में इमारत फंड में 1001 रु. दिए गए। इस अवसर पर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर शुक्रवार दिनांक 29 मई, 1953 के दिन चेंबूर विभाग गए। हैंडबिल नहीं छपे होने के बावजूद इस कार्यक्रम के लिए प्रचंड जनसमुदाय उपस्थित था।
इस अवसर पर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अस्पृश्यों को किस तरह के कपड़े पहनने चाहिए और किस प्रकार के गहने पहनने चाहिए इस पर विचार प्रकट किए-
बहनों और भाइयों,
एक हजार एक रुपये के साथ आज तक आपने इमारत फंड में चार हजार से अधिक रकम दी है। मेरे मित्र शे. का. इंप्रुवमेंट ट्रस्ट के सचिव आयु. उपशाम ने मुझे यह जानकारी दी है। आपकी बस्ती के हिसाब से यह बहुत बड़ी रकम है। आपकी तरफ से इतनी रकम दिए जाने के बारे में मैं अपना संतोष व्यक्त करता हूं। जिस प्रकार आपने कर्तव्य पूरा किया है उसी प्रकार अगर अन्य लोग भी कर्तव्य निभाएंगे तो मुंबई में ही एक लाख रुपयों से अधिक राशि का फंड इकट्ठा होगा जिसके आधार पर मुझे उम्मीद है कि हम बहुत बड़ी इमारत खड़ी कर सकेंगे।
आजकल हमारे समाज के युवाओं और युवतियों की पोषाक मुझे पसंद हैं। हमेशा अपने पास कम से कम दो पोषाकें होना जरूरी है। व्यवसाय के वक्त पहनने वाली एक पोषाक और व्यवसाय के बाद पहनने वाली दूसरी पोषाक। हमारे कई लोग विभिन्न दफतरों और कंपनियों में काम करते हैं। वहां उन्हें खाकी वर्दी मिलती है। इसे केवल काम के वक्त ही पहनना चाहिए। घर लौटने के बाद उन्हें अपने योग्य कपड़े पहनने चाहिए। नौकरी-व्यवसाय के वक्त पहने जाने वाले कपड़े सभा, समारोह अथवा शादी-ब्याह जैसे निजी कार्यक्रमों में पहनना अच्छा नहीं है।
इधर हमारे समाज के लोगों की पोषाक में बहुत बदलाव आए हैं इस बात का मुझे संतोष है। हालांकि बूढ़ी औरतों के पहनावे में बदलाव होना अभी बाकी है। जंपर, पोलका जैसे नई तरह के कपड़े पहनना अगर उन्हें पसंद नहीं है तो ना पहनें, लेकिन पुराना चोली-लुगड़े (साडी-ब्लाउज) जैसी पोषाक भी पहननी हो तो उसे ढंग से पहनें।
जनता, 14 अप्रैल, 1953