308 29-5-1953 छवि बिगाड़ने वाली पोशाकें ना पहनें - चेंबूर (मुंबई) - Page 332

 313

जरूरी नहीं कि पोषाक महंगी हो। सादी लेकिन व्यवस्थित पोषाक होना जरूरी है। पेशवा युग में हम लोगों पर कपड़े और गहने पहनने पर बहुत सारे प्रतिबंध लगाए गए थे। अस्पृश्य लोगों को हमेशा फटे-पुराने और मैले कपड़े ही पहनने चाहिए और चांदी के ही गहने पहनने चाहिए, सोने के गहने वे ना पहनें ऐसी हम पर पाबंदियां थी। लेकिन अब ये पाबंदियां नहीं हैं। इसके बावजूद हमारी महिलाएं पुराने जमाने के, भारी भरकम वेला, पायल, फुल्या, मछली, जोड़वी जैसे गहने ही पहनती हैं। उन्हें ऐसे गहने पहनना छोड़ देना चाहिए। नाक में छेद कर भारी भरकम नथ उसमें पहनना भी अब छोड़ देना चाहिए। अपनी पोषक (कपड़ों) से हम किसी खास जाति के हैं इसकी पहचान नहीं होनी चाहिए। कई बार इसके कारण मुश्किलें पैदा होती हैं।

कॉलेज की पढ़ाई के दौरान एक बार शादी में शरीक होने के लिए हमें गांव जाना पड़ा। हमारे साथ हमारे रिश्तेदारों के अलावा कुछ पुराने तरीके से जीने वाली महिलाएं भी थीं। मैं, मेरे बंधु और हमारे परिवार के लोगों की पोषाकें व्यवस्थित थीं। बंदरगाह पर उतरते ही वहां के कुलियों ने हमारा सामान उठाया और वे चल दिए। आधा रास्ता पार करने के बाद उनके ध्यान में एक बात आई कि हमारे साथ चलीं उन पुराने ढंग के रहन-सहन वाली औरतों की और हमारी जाति एक ही है। यह बात समझ में आते ही उन्होंने हमारा सामान नीचे रखा और मजदूरी लिए बगैर ही वे वहां से नौ दो ग्यारह हो गए। आखिर दो-चार चक्कर लगा कर हमें अपना सामान ले जाना पड़ा।

हरेक को अपने घर में दस आने कीमत वाली बुद्ध की तस्वीर लगानी चाहिए।